सीरिया योजना में रुकावटें

(स्रोत : द हिंदू :22 दिसंबर, 2015)

मूल लेखक- स्टेन्ली जॉनी

लगभग पांच वर्षों के युद्ध के बाद जिमसें 2,50,000 से अधिक लोग मारे गए और लाखों लोग विस्थापित हुए, ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ (UNSC) अन्ततोगत्वा सीरिया की शांति प्रक्रिया के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते पर पहुंची है। प्रस्ताव 2254 को सर्वसम्मति से पिछले सप्ताह सुरक्षा परिषद ने पारित कर दिया जिसमें सीरियाई राष्ट्रपति बसर-अल असद और विद्रोहियों के बीच एक महीने के अंदर युद्ध विराम और दमिश्क में 6 महीनों के अंदर एक विश्वसनीय समावेशी तथा गैर-सांप्रदायिक सरकार की स्थापना की मांग की गई है। इसने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और एक नए संविधान के लिए 18 महीने की समय सीमा भी निर्धारित की है जो सीरिया के भविष्य का निर्धारण करेंगे।
सीरिया के गृह युद्ध की प्रकृति और झगड़े में सीधे या परोक्ष रूप से शामिल अनेक समूहों की विभिन्न कार्य-सूचियों को देख कर यह समझना कठिन नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय की गई समय सीमा प्रत्यक्ष रूप से महत्त्वाकांक्षी है। लेकिन इसी समय समझौता बड़ी शक्तियों के सीरिया में एक सर्वमान्य आधार खोजने और विभिन्न स्वार्थों के होते हुए भी राजनैतिक समाधान के लिए मजबूत इच्छा का संकेत दिया गया है।
उभरती स्थिति
शीत युद्ध के अंत के बाद सीरिया की पहली लड़ाई है, जहां रूस और संयुक्त राज्य दोनों सैन्य रूप से हस्तक्षेप कर रहे हैं। दोनों देशों का असद सरकार के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण है।
जबकि यू.एस. उन प्रथम समूह के देशों में है जिन्होंने सरकार के ऊपर प्रतिबंध लगाए तथा श्री असद के हटाए जाने की मांग की, वहीं रूस दमिश्क के समर्थन में मजबूत स्तंभ के रूप में आया। लेकिन कुछ वर्षों से वाशिंगटन की सीरिया नीति आदर्शवादी कठोरता से उबर कर रूस के दृष्टिकोण के नजदीक व्यावहारिक लचीलेपन की ओर बढ़ी है।
सीरियाई युद्ध के प्रारंभिक चरणों में बराक ओबामा प्रशासन ने सरकार की ताकत का गलत आकलन किया। यह आशा की गई कि असद सरकार टूटने के कगार पर है जो या तो विद्रोहियों द्वारा गिरा दी जाएगी या स्वतः विघटित हो जाएगी। यह विश्लेषण ही वाशिंगटन द्वारा रूस की सीरिया में परिवर्तन की योजना को अस्वीकृत करने का कारण था। वर्ष 2008 के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और फिनलैंड के पूर्व राष्ट्रपति मार्टी अहतिसारी, जिन्होंने सीरिया पर बड़ी शक्तियों के बीच गुप्त वार्ता आयोजित की थी, हाल ही में कहा कि मॉस्को ने वर्ष 2012 की शुरुआत में तीन बिंदुओं वाली कार्य सूची प्रस्तुत की थी जिसमें श्री असद के त्यागपत्र की शर्त रखी गई थी। लेकिन ब्रिटेन, फ्रांस तथा यू.एस. ने प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया। आगे क्या हुआ एक व्यापक मानवीय विभीषिका, श्री असद बने रहे और फैले हुए गृह युद्ध के ध्वंसावशेषों से लाखों लोगों को संकट में डालने वाले आई.एस का उदय हुआ।
युद्ध के दौरान पश्चिम एशिया में वाशिंगटन के सहयोगियों, मुख्य रूप से कतर, तुर्की और सऊदी अरब की ओर से श्री ओबामा पर दमिश्क में बम गिराने के लिए असाधारण दबाव पड़ा, ताकि श्री असद को सत्ता से हटाया जा सके। सहयोगी ये जानते थे कि केवल यू.एस. ही ऐसा कर सकता है क्योंकि रूसी, श्री असद का सीधे समर्थन कर रहे हैं। लेकिन श्री ओबामा कभी आश्वस्त नहीं हुए कि श्री असद को बलपूर्वक सत्ता से हटाने पर कोई सकारात्मक परिणाम प्राप्त होगा। बल्कि वे इस संभावना के प्रति सतर्क थे कि श्री असद के बाद सीरिया उसी तरह अव्यवस्था में डूब जाएगा, जैसे इराक और लीबिया में वहां के तानाशाहों के हटने के बाद हुआ और जो आई.एस. को अपनी स्थिति और सुदृढ़ करने में सहायता करेगा। अमेरिका का एक विद्रोही समूह बनाने का प्रयास, जो सरकार और जिहादियों दोनों से लड़ सके, भी इस्लामिक आतंकियों द्वारा रौंदे जाने के कारण कमजोर पड़ गया। इसके अतिरिक्त पश्चिम में शरणार्थी समस्या ने यू.एस. और इसके सहयोगियों को झगड़े का हल खोजने के प्रयासों में तीव्रता लाने पर विवश किया। सीमित विकल्पों के बचने से यू.एस. श्री असद के प्रति अपने दृष्टिकोण का राग कम कर दिया। प्रशासन अभी भी ये चाहता है कि वे जाएं लेकिन ये नहीं कहेगा कि कब और कैसे उन्हें जाना चाहिए।
मॉस्को से संदेश
पश्चिम एशिया में सीरिया, रूसियों के लिए एक रणनीतिक परिसंपत्ति के रूप में है। पूर्व सोवियत संघ क्षेत्र के बाहर रूस का एक मात्र नौसैनिक अड्डा सीरिया के तटीय शहर ‘टर्टस’ (Tartus) में है। रूस, सीरिया को अपनी शक्ति की एक चौकी (Outpost) के रूप में भी देखता है, जहां से यह पश्चिमी एशियाई राजनीति को प्रभावित कर सके। सीरियाई गृह युद्ध के प्रारंभ से ही रूस का प्राथमिक उद्देश्य अपने हितों का संरक्षण था और ऐसा करने के लिए, असद सरकार को बने रहने में सहायता करना, एक माध्यम था। रूस ने वास्तव में अभी तक इस लड़ाई में केंद्रीय भूमिका निभाई है। इसने श्री असद को अपने रासायनिक हथियारों के जखीरे को नष्ट करने के लिए मनाया, जिससे श्री ओबामा को वर्ष 2013 में दमिश्क पर बम न गिराने के मामले में अपना बचाव करने का अवसर प्रदान किया। इसने वर्ष 1979-89 अफगान युद्ध के बाद, जब सरकार युद्ध हार रही थी, अपने पहले हस्तक्षेप के रूप में सोवियत संघ क्षेत्र के बाहर सितंबर में सीरिया में बमवर्षक भेजकर असद के विद्रोहियों पर आक्रमण किया। रूस के दांव ऊंचे हैं। लेकिन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन का दांव श्री असद पर नहीं बल्कि राज्य बाथिस्टों पर है जिनकी सीरिया में पहुंच है। यही कारण है कि श्री पुतिन ने कहा कि सीरियाई संकट का समाधान राज्यवाद की बहाली में है।,
ऐसा प्रतीत होता है कि मॉस्को ने यह महसूस कर लिया है कि श्री असद के संचालन में, आखिरकार सारा खून-खराबा और युद्ध भड़क उठा, सीरिया में स्थायी शांति पर पहुंचना असंभव है। लेकिन ठीक इसी वजह से श्री असद को यूं ही नहीं छोड़ सकता क्योंकि ऐतिहासिक रूप से, रूस की अपने सहयोगियों के प्रति ऐसी नीति नहीं है। मॉस्को संरचनात्मक परिवर्तन चाहता है जो न केवल इज्जत बचाते हुए बाहर होने का प्रस्ताव करेगा बल्कि सीरियाई राज्य को भी अखंड रहने देगा। ठीक यही संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव भी मांग कर रहा है। देखिए कि कैसे सबसे विवादास्पद समस्या ‘श्री असद का भविष्य’, को प्रस्ताव में अभिव्यक्त किया गया है। श्री असद के बारे में वर्ष 1656 शब्दों वाले मज़मून में एक भी जिक्र नहीं है। यह उनके त्यागपत्र की मांग नहीं करता, न ही यह कहता है कि वे चुनाव लड़ने के लिए पात्र हैं। यह रूस के दृष्टिकोण के करीब है कि श्री असद के भाग्य का निर्णय सीरिया के लोगों पर छोड़ दिया जाए। लेकिन प्रस्ताव स्पष्ट रूप से कहता है कि यूएन द्वारा जो चुनाव कराए जाएंगे उसमें सभी सीरियाई, प्रवासियों के सदस्यों को सम्मिलित करते हुए शरणार्थी और विस्थापित वोट डालने के पात्र होंगे। अमेरिका का आकलन यह है कि यदि प्रवासी मतदान करते हैं तो श्री असद के जीतने जैसी विषम स्थिति में कमी आएगी।
आधारभूत चुनौतियां
जबकि संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव वास्तव में शांति की ओर एक स्वागत योग्य कदम है, इसे लागू करना एक कठिन कार्य है। फिर भी यदि प्रस्ताव को अक्षरशः लागू कर भी दिया जाता है यह पूरे सीरिया को समाहित नहीं करेगा। बातचीत, सरकार जिसका मेडिटेरेनियन पट्टी पर नियंत्रण है और दक्षिण-पश्चिम के विद्रोहियों के बीच होगी। देश के बड़े हिस्से सीरिया के अलकायदा संबंधी जभात-अल-नुसरा और आई.एस. के नियंत्रण में हैं जहां लड़ाई जारी रहेगी। अतः एक एकीकृत सीरियन राज्य एक दूर का स्वप्न है। लेकिन अधिक चिंता का विषय यह है कि संयुक्त राष्ट्र का व्यावहारिक पक्ष भी बहुत जटिल और चुनौती भरा है। योजना का प्रथम चरण सरकार और विद्रोही दोनों से युद्ध विराम पर हस्ताक्षर करवाया जाए। रूस और ईरान को असद सरकार पर दबाव बनाना होगा जबकि सऊदियों और तुर्कियों को विद्रोहियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए। समस्या यह है कि सऊदी अरब और ईरान पश्चिम एशियाई भू-राजनीति में परस्पर विरोधी हैं और एक दूसरे से प्रमुख रणनीतिक मामलों में गहरा अविश्वास रखते हैं। सीरियाई सीमा पर तुर्की द्वारा रूसी युद्ध विमान को मार गिराए जाने के बाद से मॉस्को तथा अंकारा के बीच रिश्ते रसातल पर पहुंच गए हैं।
सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि कौन सीरियाई विपक्ष में उदार विद्रोही है और कौन आतंकी है। यू.एन. वार्ता से पहले सऊदी अरब और तुर्की ने जॉर्डन से आतंकी और गैर-आतंकी विद्रोहियों की सूची तैयार करने के लिए कहा था। यह एकमत है कि आई.एस. को बाहर रखा जाना चाहिए तथा जभात अल-नुसरा को सम्मिलित करने पर लगभग सहमति है। लेकिन दो विवादास्पद सशस्त्र समूहों पर असहमति है, सऊदी समर्थित जेस-अल इस्लाम, एक 12 इस्लामिक और सेलाफिस्त समूहों का गठबंधन और तुर्की तथा कतर समर्थित अहरार-अल शाम। श्री असद के क्षेत्रीय शत्रु इन दोनों समूहों को विपक्षी मेज के भाग के रूप में देखना चाहते हैं जबकि दमिश्क, मास्को और तेहरान इन्हें आतंकवादी कहते हैं। अहरार-अल शाम एक 25000 से अधिक लड़ाकों का समूह विशेष रूप से बहुतों द्वारा संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। समूह के अल-नुसरा से सैन्य संबंध हैं। इस पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के व्यापक आरोप हैं। वह असद के बाद सीरिया में शरीया की स्थापना भी चाहते हैं जो कि विश्व नेताओं द्वारा सीरिया को समावेशी प्रजातांत्रिक राज्य बनाने में सीधी चुनौती है। ये दोनों समूह पिछले महीने रियाद में होने वाले विद्रोही सम्मेलन के भाग थे, अर्थात सऊदी इन्हें आतंकी संगठन के रूप में ब्लैक लिस्ट नहीं करेंगे। अभी यह भी देखना है कि दमिश्क कैसे प्रतिक्रिया करेगा यदि ये समूह भी वार्ता के दल का भाग बनते हैं।
विद्रोह का राष्ट्रीयकरण
एक रंग में भंग करने वाली प्रबल बात है, सऊदी-कतर धुरी का असद को हटाने का जुनून। रियाद सम्मेलन में सऊदी विदेश मंत्री अदेल-अल जुबैर ने कहा था श्री असद के पास दो विकल्प हैं ‘‘या तो वे बातचीत के माध्यम से पद छोड़ दें या उन्हें बलपूर्वक सत्ता से हटाया जाए।’’
यू.एन. योजना के अनुमोदित होने के बाद तुर्की के प्रधानमंत्री अहमत दवुत्तोग्लू ने शांति प्रस्ताव पर तीव्र प्रतिक्रिया करते हुए कहा कि यह वास्तविक परिप्रेक्ष्य से रहित है, जब कि यह कहा कि सीरिया समस्या तभी हल होगी जब श्री असद सत्ता छोड़ देंगे। असद को सत्ता से हटाने से अधिक महत्त्वपूर्ण है विद्रोह का राष्ट्रीयकरण कर देना मिलिशिया समूहों को शस्त्र रहित करना और राज्य का शस्त्रों पर एकाधिकार स्थापित करना और केवल तभी सशक्तर सीरियाई राज्य जिहादियों के विरुद्ध युद्ध लड़ सकेगा। साथ-साथ टूटी हुई जिंदगियों का पुनर्निर्माण कर सकेगा। यदि यह पहले नहीं होता है, तो पूरी परिवर्तन प्रक्रिया खतरे में पड़ जाएगी। क्या यह असद के क्षेत्रीय शत्रु होने देंगे एक प्रश्न है।

अनुवादक – राजेश त्रिपाठी