सरस्वती सुपरक्लस्टर की खोज

Discovering the Saraswati Super Cluster

अधिकांश वैज्ञानिक यह मानते हैं कि प्रारंभिक ब्रह्मांड में ऊर्जा एवं पदार्थ का वितरण असमान था। घनत्व में आरंभिक भिन्नता के कारण गुरुत्वाकर्षण बलों में भिन्नता आई। इससे पदार्थ का एकत्रण हुआ, जिसने आकाशगंगाओं के विकास को आधार प्रदान किया। वास्तव में आकाशगंगा (Galaxy) ऐसे तारों का समूह है, जो अपने ही गुरुत्वाकर्षण बल के कारण एक-दूसरे से परस्पर बंधे हुए होते हैं। एक आकाशगंगा में एक-दूसरे के निकट रहने वाले अरबों तारे शामिल होते हैं और ब्रह्मांड में ऐसी अरबों आकाशगंगाएं हैं। कुछ आकाशगंगाएं आकार में ‘सर्पिल’ (Spiral) होती हैं, तो कुछ ‘दीर्घवृत्ताकार’ (Elliptical)। हालांकि, कुछ ऐसी आकाशगंगाएं भी हैं जिनका कोई निश्चित आकार नहीं है। हमारा सौरमंडल जिस आकाशगंगा का सदस्य है, उसका नाम ‘मिल्की वे’ (Milky Way) यानि दुग्धमेखला है। यह आकार में सर्पिलाकार है। इसमें तारों की संख्या 100-400 बिलियन अनुमानित है।
आकाशगंगाएं ब्रह्मांड की मूलभूत अंग हैं, ये अनियमित रूप से इधर-उधर बिखरी होने के बजाए समूहबद्ध होती हैं। आकाशगंगाओं के इन समूहों को ‘क्लस्टर’ (Cluster) कहते हैं। कई क्लस्टर पुनः समूहबद्ध होकर सुपरक्लस्टर (Supercluster) का निर्माण करते हैं। मिल्की वे आकाशगंगा दर्जनों अन्य आकाशगंगाओं के साथ ‘लोकल ग्रुप’ (Local Group) ‡लस्टर में शामिल है, जो पुनः ‘लानीयाकिया सुपरक्लस्टर’ (Laniakea Supercluster) का अंग है।

  • हाल ही में आईयूसीएए (Inter University Centre for Astronomy & Astrophysics : IUCAA), पुणे; भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, पुणे (Indian Institute of Science Education & Research : IISER); राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, जमशेदपुर तथा न्यूमेन कॉलेज, तोडुपुजा (केरल) के वैज्ञानिकों ने आकाशगंगाओं के एक बहुत बड़े सुपरक्लस्टर की खोज की है।
  • उन्होंने इसे ‘सरस्वती’ नाम दिया है।
  • यह सुपरक्लस्टर पृथ्वी से 400 करोड़ प्रकाश वर्ष की दूरी पर मीन तारामंडल (Constellation Pisces) में स्थित है।
  • यह नव-अन्वेषित सुपरक्लस्टर 600 मिलियन प्रकाश वर्ष के दायरे में विस्तृत है और ब्रह्मांड में अब तक ज्ञात सबसे बड़ी संरचनाओं में से एक है।
  • सरस्वती सुपरक्लस्टर में आकाशगंगाओं के कुल 43 क्लस्टर शामिल हैं।
  • सरस्वती सुपरक्लस्टर की विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसका कुल द्रव्यमान लगभग 20 मिलियन बिलियन सूर्यों के बराबर है।
  • उल्लेखनीय है कि सरस्वती सुपरक्लस्टर का नाम विद्या, संगीत एवं कला की देवी ‘सरस्वती’ के नाम पर रखा गया है।
  • सरस्वती सुपरक्लस्टर की खोज ने वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड के जन्म और विकास से जुड़ी मूल धारणाओं पर नए सिरे से विचार करने पर विवश कर दिया है।
  • इस खोज से डार्क मैटर और डार्क एनर्जी जैसे ब्रह्मांड के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने में मदद मिल सकती है।
  • ज्ञातव्य है कि सरस्वती सुपरक्लस्टर की खोज ‘स्लोअन डिजिटल स्काई सर्वे’ (Sloan Digital Sky Survey) नामक दूरस्थ आकाशगंगाओं के एक स्पेक्ट्रोस्कोपिक सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों की मदद से की गई है।
  • ब्रह्मांड का डिजिटल त्रिविमीय मानचित्र तैयार करने के उद्देश्य से यह सर्वेक्षण वर्ष 2000 में प्रारंभ हुआ था।
  • सरस्वती सुपरक्लस्टर की खोज से संबंधित यह शोध-पत्र ‘अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी’ के प्रतिष्ठित ‘द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल’ (The Astrophysical Journal) के नवीनतम संस्करण में प्रकाशित हुआ है।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • आकाशगंगाओं के समूह को परिभाषित करने के लिए ‘क्लस्टर’ (Cluster) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अमेरिकी खगोलशास्त्रियों ‘हार्लो शापले’ (Harlow Shapley) एवं ‘एडिलेड आमेस’ (Adelaide Ames) ने वर्ष 1926 में किया था।
  • आकाशगंगाओं के पहले सुपरक्लस्टर ‘शापले सुपरक्लस्टर’ की खोज वर्ष 1989 में सॉमक रे चौधरी के नेतृत्व में एक अनुसंधान दल ने की थी।
  • सॉमक रे चौधरी IUCAA के वर्तमान निदेशक हैं और सरस्वती सुपरक्लस्टर की खोज में भी शामिल हैं।
  • आकाशगंगाओं का दूसरा सुपरक्लस्टर ‘द स्लोअन ग्रेट वॉल’ (The Sloan Great Wall) वर्ष 2003 में खोजा गया था।

लेखक सौरभ मेहरोत्रा