सरकारी खरीद में ‘मेक इन इंडिया’ को प्राथमिकता

Make In India Priority In Government Purchase
  • पृष्ठभूमि
    भारत के निर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए 25 सितंबर, 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम की शुरुआत की, जिससे भारत को निवेश एवं निर्माण, संरचना तथा अभिनव प्रयोगों के वैश्विक केंद्र के रूप में परिवर्तित किया जा सके। मेक इन इंडिया मुख्यतः निर्माण क्षेत्र पर केंद्रित है लेकिन इसका उद्देश्य देश में उद्यमशीलता को बढ़ावा देना भी है। इसका दृष्टिकोण निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाना, आधुनिक एवं कुशल बुनियादी संरचना, विदेशी निवेश के लिए नए क्षेत्रों को खोलना और सरकार एवं उद्योग के मध्य एक साझेदारी का निर्माण करना है। हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा सरकारी खरीद में ‘मेक इन इंडिया’ को प्राथमिकता देने के लिए नीति का अनुमोदन किया गया है।
  • सरकारी खरीद में ‘मेक इन इंडिया’ को प्राथमिकता
  • 24 मई, 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा सरकारी खरीद में ‘मेक इन इंडिया’ को प्राथमिकता देने की नीति को स्वीकृति प्रदान की गई।
  • नीति का कार्यान्वयन सामान्य वित्तीय नियम, 2017 के नियम 153 (III) के अनुसरण में एक आदेश के माध्यम से किया जाएगा।
  • नीति के तहत स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को सरकारी खरीद में प्राथमिकता दी जाएगी।
  • स्थानीय आपूर्तिकर्ता वे हैं जिनके सामान या सेवाएं स्थानीय सामग्री के लिए निर्धारित न्यूनतम सीमा (सामान्यतः 50%) को पूरा करती हैं।
  • स्थानीय सामग्री अनिवार्य रूप से घरेलू मूल्य संवर्धन है।
  • 50 लाख रुपये एवं उससे कम की वस्तुओं की खरीद में और जहां नोडल मंत्रालय यह निश्चित करता है कि खरीद से संबंधित क्षेत्र में पर्याप्त स्थानीय क्षमता एवं स्थानीय प्रतिस्पर्धा है, ऐसे मामलों में केवल स्थानीय आपूर्तिकर्ता पात्र होगा।
  • 50 लाख रुपये से अधिक राशि की खरीद के लिए (या जहां स्थानीय क्षमता/प्रतिस्पर्धा अपर्याप्त है) यदि न्यूनतम बोली किसी गैर-स्थानीय आपूर्तिकर्ता द्वारा नहीं दी गई है, तब न्यूनतम लागत वाले स्थानीय आपूर्तिकर्ता को, जो न्यूनतम बोली के 20 प्रतिशत अंतर के भीतर है, न्यूनतम बोली को स्वीकार करने का अवसर दिया जाएगा।
  • यदि खरीद का स्वरूप इस प्रकार का है कि खरीद आदेश को विभाजित कर एक से अधिक आपूर्तिकर्ता को दिया जा सकता है, तो खरीद आदेश का आधा न्यूनतम बोली लगाने वाले गैर-स्थानीय आपूर्तिकर्ता को प्राप्त होगा और शेष आधा न्यूनतम बोली मूल्य को स्वीकार करने वाले स्थानीय आपूर्तिकर्ता को दिया जाएगा।
  • 5 लाख रुपये से कम की छोटी खरीद को इस नीति से छूट प्रदान की गई है।
  • उपर्युक्त आदेश स्वायत्तशासी निकायों, सरकारी कंपनियों/सरकारी नियंत्रणाधीन इकाइयों पर भी लागू होगा।
  • नीति के अनुसार, निविदाओं में विनिर्देशों (Specifications) को प्रतिबंधात्मक नहीं होना चाहिए। उदाहरणार्थ निविदा के लिए अन्य देशों में आपूर्ति के प्रमाण या पूर्व अनुभव के संबंध में निर्यात के प्रमाण की आवश्यकता नहीं होगी।
  • नीति के तहत प्राथमिक रूप से स्व-प्रमाणीकरण पर आधारित स्थानीय सामग्री के सत्यापन के लिए एक प्रक्रिया की व्यवस्था की गई है।
  • कुछ मामलों में वैधानिक/लागत लेखा परीक्षकों आदि द्वारा सत्यापन की आवश्यकता होगी।
  • नीति के अनुसार, झूठी घोषणाओं के लिए कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
  • ‘औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग’ (DIPP) की एक स्थायी समिति इस आदेश के कार्यान्वयन एवं उनसे उत्पन्न मामलों को देखेगी और नोडल मंत्रालयों एवं खरीद संस्थाओं को सिफारिशें करेगी।
  • लाभ
  • नई नीति से घरेलू विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा जिससे रोजगार सृजन होगा।
  • इससे घरेलू विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र में पूंजी एवं तकनीकी का प्रवाह बढ़ेगा।
  • इस नीति से ‘मेक इन इंडिया’ दृष्टिकोण के अनुरूप कथित मदों के पुर्जे, घटकों, उप-घटकों आदि के विनिर्माण की दिशा में तीव्र गति आएगी।
  • निष्कर्ष
    यह नई नीति भारत सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ को प्रोत्साहन देने और देश में वस्तुओं एवं सेवाओं के विनिर्माण तथा उत्पादन को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता का प्रतिबिंब है जिससे लोगों की आय और उनके लिए रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकें। मात्रा की दृष्टि से सरकार की खरीद काफी बड़ी है जो इस नीति के उद्देश्य को साकार करने में योगदान दे सकती है। इस नीति की रूपरेखा खरीद कार्य प्रणालियों एवं आदेशों के कार्यान्वयन को मजबूती प्रदान करने वाले खरीद के मूल सिद्धांतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

मेक इन इंडिया के तहत निर्माण को बढ़ावा देने हेतु लक्ष्य

  •  मध्यम अवधि में निर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर में प्रति वर्ष 12-14 प्रतिशत की वृद्धि करना।
  • वर्ष 2022 तक देश के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण की हिस्सेदारी में 16-25 प्रतिशत की वृद्धि करना।
  • विनिर्माण क्षेत्र में वर्ष 2022 तक 100 मिलियन रोजगार के अतिरिक्त अवसर सृजित करना।
  • समावेशी विकास के लिए ग्रामीण प्रवासियों और शहरी गरीबों के लिए उचित कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।
  •  घरेलू मूल्य संवर्धन और निर्माण में तकनीकी गहराई में वृद्धि करना।
  •  भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना।
  •   विशेष रूप से पर्यावरण के संबंध में विकास की स्थिरता सुनिश्चित करना।

लेखक -नीरज ओझा

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