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संघ-राज्य संबंध : सुधारों की आवश्यकता

केंद्र में मोदी सरकार के गठन के साथ ही संघ-राज्य संबंधों में सुधारों की आवश्यकता एक बार फिर सुर्खियों में है। ऐसा माना जा रहा है कि एक मुख्यमंत्री के रूप में प्रधानमंत्री इन जरूरतों से रूबरू रहे हैं और वे इसमें खासी दिलचस्पी लेंगे। योजना आयोग के स्थान पर नवगठित संस्था नीति आयोग में गवर्निंग कौंसिल को स्थान देना इसी दिशा में एक कदम है। संघ-राज्य संबंध : सुधारों की आवश्यकता पर पद्मभूषण डॉ. सुभाष काश्यप का आलेख यहां प्रस्तुत है।
भारत में संघ को मजबूत करने का एकमात्र उपाय यह है कि वह अपनी शक्तियों में कमी करे और मुख्य बातों की ओर ही ध्यान दे। आर्थिक उदारीकरण के साथ राजनीतिक शक्ति और व्यवस्था का विकेंद्रीकरण आवश्यक हो गया है। भारत संघ को फेडरल संघ का रूप देने के लिए यह जरूरी है कि वह स्वायत्तशासी इकाइयों के रूप में काम करे। इस व्यवस्था में शासन के अनेक स्तर हो सकते हैं-पंचायतों से संसद और संघ सरकार तक। प्रस्तावित शासन-संगठन संकेंद्रित वृत्तों से युक्त होने के कारण गांधीजी के आदर्श के निकट होगा। शक्तियों का वितरण इस तरह होना चाहिए कि हर उच्चतर स्तर की प्रशासनिक इकाई को कम से कम आवश्यक शक्तियां दी जाएं, जो काम तृणमूल धरातल की संस्थाएं कर सकें, वह उनके हाथ में छोड़ देना चाहिए। उच्च स्तर की सरकार को यह शक्ति नहीं होनी चाहिए कि वह निम्न स्तर की विधिवत निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर दे।
यदि हम सचमुच बहुस्तरीय शासन की स्थापना करना चाहते हैं और तृणमूल धरातल पर लोगों को सत्ता सौंपना चाहते हैं तो संविधान के अनुच्छेद 245, 246 तथा अन्य प्रासंगिक अनुच्छेदों तथा 7वीं अनुसूची में संशोधन कर संघ, राज्यों और पंचायतों तथा नगरपालिकाओं की स्थानीय सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट वितरण करना होगा। इससे संविधान के बुनियादी ढांचे अथवा संसदीय प्रणाली पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके कारण सुशासन तथा आर्थिक विकास में सहायता ही मिलेगी।
अब समय आ गया है कि संघ-राज्य संबंधों तथा स्थानीय शासन-संस्थाओं की व्यापक समीक्षा की जाए। इस विषय में कोई सर्वतः स्वीकृत प्रतिमान नहीं हो सकता। भारत को स्थायित्व, सुरक्षा और विकास की आवश्यकता है। यह लक्ष्य एकात्मक और फेडरल राज्य-व्यवस्था के बीच समन्वय स्थापित करने से प्राप्त हो सकता है। सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि राजनीतिक व्यवस्था में स्थिरता बनी रहे। इसके साथ ही वह लोगों के प्रति उत्तरदायी भी होनी चाहिए। नया फेडरल राज्य स्वायत्तशासी इकाइयों का संयुक्त राज्य बनेगा। ये स्वायत्तशासी इकाइयां संघ की अधीन या सहायक इकाइयां नहीं होंगी। वे विभिन्न धरातलों पर फेडरेशन की भागीदार होंगी। भारत फेडरल संघ होगा जिसमें शासन के अनेक स्तर होंगे। सत्ता की शृंखला पंचायतों से शुरू होकर संसद तक पहुंचेगी।
(i) पृथक राज्यों की राजनीतिक मांगों को जातीय आकांक्षाओं से अलग करके देखना चाहिए। सिद्धांततः सुशासन की दृष्टि से बढ़ती हुई आबादी के कारण छोटे-छोटे राज्य अच्छे हो सकते हैं। संख्या में अधिक राज्य संघ को मजबूती देंगे। कुछ स्थितियों में नए राज्यों का निर्माण करने की अपेक्षा उप राज्य संरचनाओं का गठन किया जा सकता है। संपूर्ण देश को 4-5 जोनों तथा 40-50 छोटे-छोटे राज्यों में बांटना हितकर होगा। ये राज्य यथा-संभव समान आकार के होने चाहिए तथा इन्हें संसद के दोनों सदनों में या कम से कम एक सदन में समान प्रतिनिधित्व प्राप्त होना चाहिए। आशा की जा सकती है कि प्रस्तावित परिवर्तनों से ज्यादा स्थिरता, जवाबदारी, मजबूत संघ, सुशासित, विकसित और तेजी से विकाशील राज्यों का पथ प्रशस्त होगा।
(ii) राज्यपालों की नियुक्ति के मानदंडों में परिवर्तन होने चाहिए। सरकारिया आयोग की सिफारिशों की परीक्षा होनी चाहिए और उन्हें कार्यान्वित किया जाना चाहिए।
(iii) अनुच्छेद 356 से संबंधित समस्याएं अनुच्छेद 256, 257, 355, 356 और 365 के अनुचित क्रियान्वय के कारण पैदा हुई हैं। इन सब अनुच्छेदों को एक साथ पढ़ने की जरूरत है। अनुच्छेद 355 के अधीन संघ सरकार, अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन लागू किए बिना राज्य के प्रति कुछ दायित्वों का निर्वहन कर सकती है।
(iv) अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के कारण केंद्रीय नियंत्रण की आवश्यकता नहीं रहती। आय कर, निगम कर और परोक्ष करों को समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया जा सकता है। इससे कर-प्रणाली में सुधार और समन्वय होगा।
(v) संघ-राज्य संबंधों पर समग्र दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है। राजनीतिक सत्ता चार स्तरों पर विभक्त होनी चाहिए। विभिन्न समूहों को शासन में भागीदार बनाने की जरूरत है। इससे संघ मजबूत बनेगा और राष्ट्र में भावनात्मक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से निखार आएगा। शक्तियों का वितरण ऐसा होना चाहिए कि शासन के प्रत्येक उच्चतर स्तर को न्यूनतम आवश्यक शक्तियां दी जाएं। उदाहरण के लिए ग्राम पंचायतें या नगरपालिकाएं जैसी तृणमूल संस्थाएं जो काम कर सकें वह काम पूरी तरह उनके ऊपर छोड़ देना चाहिए। उच्चतर स्तर की सरकार को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह अपने से नीचे स्तर की विधिवत निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर सकें। कुशल राज्यकर्मचारी लोकतंत्रात्मक विकेंद्रित शासन का स्थान नहीं ले सकते।
(vi) ग्यारहवीं और बारहवीं अनुसूची को आदेशात्मक बना देना चाहिए। इन दोनों अनुसूचियों को मिलाकर एक सामान्य सूची का निर्माण करना चाहिए। संसद सदस्यों तथा विधायकों को जिला विकास प्रक्रिया का भाग नहीं होना चाहिए। विधि और व्यवस्था के कार्य स्थानीय निर्वाचित निकायों को ही सौंपना ठीक होगा। ग्राम सभा और ग्राम पंचायतों की शक्तियों का वर्गीकरण करना आवश्यक होगा। स्थानीय निकायों के लिए स्थानीय कर्मचारी रखे जाने चाहिए।
(vii) संसद सदस्यों की क्षेत्रीय विकास योजना शक्तियों के वितरण के फेडरल सिद्धांत के प्रतिकूल है।
(viii) उत्तर-पूर्वी राज्यों में अवैध देशांतरण को रोकना चाहिए। शासन की स्थानीय परंपरागत संस्थाओं को आधुनिक रूप देने और महिलाओं के साथ न्याय करने की आवश्यकता है। इन परंपरागत संस्थाओं को शासन की संस्थाएं बनाया जा सकता है। राज्य सरकार, स्वायत्तशासी जिला परिषदों और शासन की परंपरागत प्रणाली के अधिकार-क्षेत्र एक-दूसरे से मिलते हैं। इससे अनेक समस्याएं पैदा होती हैं। अधिकार क्षेत्र की इस परस्पर-व्याप्ति को रोकने की आवश्यकता है। प्रत्येक स्तर की अधिकारिता का स्पष्ट रूप से निरूपण करना उचित है। छठीं अनुसूची में संशोधन कर स्वायत्तशासी जिला परिषदों को अधिक स्वायत्तता दी जानी चाहिए। स्वायत्तशासी जिला परिषदों में गैर-कबाइली लोगों की भागीदारी का प्रश्न विचारणीय है। परंपरागत संस्थाओं, स्वायत्तशासी जिला परिषदों तथा अधीन न्यायपालिका के परस्पर-व्याप्त अधिकार-क्षेत्र के कारण न्याय-प्रशासन में दिक्कतें पैदा हो रही है। उन्हें सुलझाने की आवश्यकता है। मानव अधिकारों तथा कबाइली अधिकारों के संघर्ष और संरक्षण विधियों को भी समझने और सुलझाने की जरूरत है।