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राष्ट्रीय गौरव एवं पूर्वाग्रह

(स्रोत : द हिंदू : 5 दिसंबर, 2015)

मूल लेखक- अनुराधा रमन

तुम्हें भारत के गौरव के लिए खड़े होना चाहिए, तुम्हें सीमा पर तुम्हारी रक्षा करने वाले सैनिकों के लिए खड़े होना चाहिए। मेरी आंखें आंसुओं से भर उठती हैं जब मैं क्रिकेट मैच के दौरान राष्ट्रगान होते हुए देखता और सुनता हूं और यह केवल 90 सेकंडों का मामला है। ‘‘यह ऐसा कुछ नहीं है कि आपको किसी अकल्पनीय बुरे की ओर धकेला जा रहा हो।’’
अनुपम खेर (फिल्म अभिनेता)
यह श्री खेर का, द हिंदू द्वारा पूछे गए उस प्रश्न का प्रत्युत्तर था, जिसमें मुंबई के एक सिनेमा हाल में दर्शकों के एक समूह द्वारा एक परिवार के सदस्यों के साथ, राष्ट्रगान बजने के दौरान सावधान की मुद्रा में न खड़े होने पर धक्का-मुक्की करके बलपूर्वक बाहर जाने पर विवश करने की घटना, पर पूछा गया था। श्री खेर ही अकेले नहीं हैं जो देशभक्ति को, राष्ट्रीय ध्वज, गान, भारत के नक्शे तथा क्रिकेट टीम से नजदीकी के तौर पर जोड़ते हैं, आप इस तालिका में गाय को भी जोड़ सकते हैं जबकि लोग बढ़-चढ़ कर अपने देशभक्ति के जोश को, इन प्रतीकों के प्रदर्शन किए जाने पर व्यक्त करते हैं।
लेकिन क्या यदि मैं किसी व्यावसायिक विज्ञापन के शुरू में राष्ट्रगान बजने पर बैठे रहना पसंद करती हूं? क्या यदि मैं यह निर्णय लेती हूं किसी फिल्म के टाइटल रोल के चलते समय राष्ट्रगान का बजना ‘गान’ की गरिमा को कम करता है? क्या यदि मैं क्रिकेट मैच के समय राष्ट्र ध्वज फहराए जाने पर सावधान नहीं खड़ी होती हूं या जब किसी भारतीय द्वारा किसी टूर्नामेंट में पदक जीत लेने पर राष्ट्रगान बजता है। मेरा आशय न तो टीम के प्रति और न ही ध्वज या गान के प्रति अनादर करना होता है। क्या यदि मैं भारतीय क्रिकेट टीम की प्रशंसा करना नहीं पसंद करती हूं और मेरा नामांत खान है? क्या हल यह है कि मुझे पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए?
हाल ही की असामी फिल्म ‘कोथानोदी’ के निर्देशक भास्कर हजारिका कहते हैं ‘‘फिल्म के प्रारंभ में राष्ट्रगान बजना गरिमा कम करता है, खड़े होना प्रतीकात्मक हो जाता है, और क्यों यह देशभक्ति का मापदंड होना चाहिए?’’ प्रसिद्ध निर्देशक आनंद पटवर्धन कहते हैं ‘‘राष्ट्रगान बहुत ही विशिष्ट अवसरों पर बजाया जाना चाहिए।’’ ऐसा प्रत्येक कार्यक्रम में प्रत्येक दिन करके वे इसके अर्थ को ही नष्ट कर रहे हैं।
संसद द्वारा, बांग्लादेश युद्ध के बाद पारित ‘राष्ट्रीय गौरव के निरादरों से संबंधित अधिनियम, 1971’ को पढ़ने पर वास्तव में यह स्पष्ट होता है कि ये वे व्यक्ति नहीं हैं जो बैठे रहें बल्कि वे व्यक्ति या लोग हैं जिन्होंने उनके साथ धक्का-मुक्की करके कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा की। अधिनियम की धारा-3 कहती है ‘‘जो भी जान-बूझ कर राष्ट्रगान को गाए जाने से रोकता है या व्यवधान पैदा करता है अधिकतम तीन वर्ष के कारावास या जुर्माने द्वारा या दोनों द्वारा दंडित किया जाएगा।
सरकार का दृष्टिकोण :-
इस समस्या पर केंद्र सरकार की स्थिति को 5 जनवरी, 2015 के ‘सामान्य प्रावधान आदेश’ के द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है, जब यह कहा गया, ‘‘जब भी राष्ट्रगान गाया जाए या बजे स्रोता सावधान की अवस्था में खड़े हो जाएंगे।’’ फिर भी जब राष्ट्रगान समाचार शृंखला, वृत्त चित्र के प्रदर्शन के दौरान फिल्म के एक भाग के रूप में बजता है, तो दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जाती है क्योंकि इससे प्रदर्शन में बाधा तथा भ्रम की स्थिति ही पैदा होगी बजाय राष्ट्रगान की गरिमा में योगदान के।
दूसरी ओर न्यायालयों ने भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्त्व दिया है। फिर भी अब हम क्या देखते हैं कि सामाजिक मीडिया और सार्वजनिक स्थलों पर लोगों द्वारा धार्मिक रूढ़िबद्धता ही नहीं बल्कि इनसे जुड़े गौरव को प्रतीकों से संबद्ध करने पर अधिक से अधिक जोर दिया गया। राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और क्रिकेट का विषय सम्मुख होने पर यह राष्ट्रीय सम्मान का मसला हो जाता है और कोई अतिक्रमण सहन नहीं किया जाता। युवा कश्मीरी विद्यार्थियों को निष्कासित करना बहुत आसान हो जाता है यदि वे भारतीय क्रिकेट टीम की तारीफ नहीं करते और भी बुरा यदि पाकिस्तान टीम की तारीफ करते हैं। जब उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अपने कार्यालय से जुड़ी आचार संहिता के तहत राष्ट्रीय ध्वज को इस वर्ष गणतंत्र दिवस के दिन सलामी नहीं दी, हामिद अंसारी ने राष्ट्रीय ध्वज को सलामी क्यों नहीं दी? ट्विटर पर चर्चा होने लगी, कुछ रोषपूर्वक चिल्लाए कि उपराष्ट्रपति जिहादियों से सहानुभूति रखते थे और अधिक उपद्रव हुआ और किसी ने यहां तक सलाह दे डाली कि अंसारी को आई.एस. में शामिल हो जाना चाहिए।
उपराष्ट्रपति कार्यालय को उपराष्ट्रपति और कार्यालय से जुड़ी आचार संहिता की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए वक्तव्य जारी करने पर विवश होना पड़ा।
यह किसी को समझ में नहीं आया कि यह उपराष्ट्रपति की पहचान पर हमला है। उच्चतम न्यायालय के वकील राजीव धवन कहते हैं ‘‘हम उस स्थिति में पहुंच रहे हैं जहां देशभक्ति एक बिल्ला है जिसे आपको पहनना चाहिए, जिसका आपको पालन करना चाहिए। राष्ट्रीयता के साथ-साथ इन प्रतीकों पर बढ़-चढ़ कर जोर दिया जा रहा है और मुसलमानों को अपनी निष्ठा सिद्ध करनी होगी।
राष्ट्र जब युद्ध पर होते हैं, तो राष्ट्रगान और प्रतीकों की अपनी एक भूमिका होती है, अब ये थम चुके हैं और राष्ट्र इन्हें कोई विशेष महत्त्व नहीं देते।’’
स्वतंत्रता से पहले ध्वज और राष्ट्रगान ने औपनिवेशिक शक्ति के विरुद्ध क्रांति को गति दी। वर्ष दर वर्ष, जैसा कि धवन कहते हैं, इनका अनुपालन तीव्र होता गया।
पश्चिम में
जबकि अमेरिका झंडे को जलाया जाना भी बर्दाश्त कर लेता है और यूनाइटेड किंगडम ‘यूनियन जैक’ को ‘फैशन स्टेटमेंट’ के रूप में प्रयुक्त किए जाने की अनुमति व्यक्तियों को प्रदान कर देता है और भारत में राष्ट्रीय ध्वज को न फहराए जाने पर, जैसे जम्मू तथा कश्मीर में एक राजनैतिक विवाद बन जाता है। यदि किसी अल्पसंख्यक संस्था में राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया जाता है, तो उस पर घोर विपदा टूट पड़ती है। राष्ट्रीय माहौल में एक अशांति सी व्याप्त है, जहां किसी भी अतिक्रमण को राष्ट्रीय कमजोरी के रूप में देखा गया है। यह ऐसे है जैसे देश के गौरव पर आक्रमण हुआ हो।
हैदराबाद विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान की प्रवक्ता मंजरी काटजू कहती हैं ‘‘यूके, यूएस और यूरोप में कट्टर राष्ट्रवाद और अंध राष्ट्रीयता अपना सिर उठा रही है और अंध राष्ट्रभक्तों एवं उदारवादी राष्ट्रवादियों के बीच तीव्र युद्ध छिड़ा हुआ है।’’ भारत के मामले में अंतर यह है कि व्यक्तिगत रूप में नागरिकों के मूल अधिकारों पर सामाजिक ताकतों एवं राज्य तंत्र द्वारा हुए आक्रमण से सुरक्षा प्रदान करने के लिए पर्याप्त रूप से मजबूत संस्थाएं नहीं हैं, यह भी कि हमारे अधिकांश कानून उदार औपनिवेशिक संदर्भों से ही अटके हुए हैं जिसमें वे सर्वप्रथम बनाए गए थे। प्रो. काटजू बताती हैं ‘‘मध्यम वर्गीय और उच्च वर्गीय शहरी भारत में भारत के किसी अन्य सामाजिक वर्ग के मुकाबले कहीं अधिक, ‘राष्ट्र खतरे में है’ के उदघोष से हड़कंप मच जाता है।’’ वे यह, कहती हैं, ‘‘शिक्षा, रोजगार और आवास के प्रति असुरक्षा के रूप में जड़ें जमाएं हैं जो राष्ट्रीय असुरक्षा की भावनाओं के द्वारा प्रतिबिंबित और आवर्धित होता है।’’ यह अपने आप को एक प्रकार की आक्रामक देशभक्ति के रूप में व्यक्त करता है जो मुंबई के सिनेमा हॉल में दिखाई पड़ी।
इतिहासकारों द्वारा बहुधा यह कहा जाता है कि भारतीय राष्ट्रवाद ‘स्थापना’ की स्थिति से कहीं अभी बहुत दूर है और इसकी जड़ें स्वतंत्रता के समय से ही चली आ रही चुनौतियों के सामना करने में हैं। चाहे वर्ष 1980 के दौर का पंजाब हो, कश्मीर हो, वर्ष 1960 के दौर में राष्ट्रभाषा/भाषाओं का विवाद हो, वर्ष दर वर्ष विचलन उभरते रहे हैं। अतः जब इतिहासकार सलिल मिश्रा, जो अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में पढ़ाते हैं, कहते हैं कि हिंदी बोलना देशभक्ति का परीक्षण बन जाता है और ऐसे परीक्षण लोगों द्वारा भोजन, भाषा, ध्वज एवं राष्ट्रगान के संदर्भ में उत्तीर्ण करने होंगे, यह देखना कठिन नहीं होगा कि कैसे ये क्रियाशील होकर, जिसे श्री धवन ‘टिन्डर बॉक्स समाज’ कहते हैं, की ओर ले जाएंगे और परिणामस्वरूप टिन्डर बॉक्स विस्फोट हो जाएगा। या जैसा कि ‘समाज एवं धर्म निरपेक्षता अध्ययन केंद्र, मुंबई के अध्यक्ष राम पुनियानी के कथनानुसार ‘‘देशभक्ति को कट्टरता का रंग दिया जा रहा है और प्रत्येक बात भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में स्थापित है।’’
और किस प्रकार ये बहस रची गई है कि कोई प्रश्न उठाने वाला व्यक्ति पाकिस्तान भेजा जा सकता है। श्री पुनियानी वास्तव में कहते हैं, ‘‘टैगोर अंतर्राष्ट्रीय मानवता के लिए खड़े हुए जहां उन्होंने राष्ट्रवाद को बीतने वाले दौर के रूप में देखा, मैं राष्ट्रगान पर खड़ा होना पसंद करता हूं लेकिन मैं किसी का निर्णय नहीं करूंगा जो नहीं खड़ा होता है।’’
वंदेमातरम् की जीवनी के लेखक सव्यसाची भट्टाचार्य कहते हैं कि ‘‘वर्तमान समय में सभी राष्ट्रीय प्रतीकों ने स्पष्ट महत्त्व ग्रहण कर लिया है।’’
दिल्ली में तेजी से स्कूलों ने राष्ट्रीय गीत (वंदेमातरम्) और राष्ट्रगान गाए जाने की प्रथा प्रारंभ कर दी है। अभी तक किसी ने इन्हें न गाना पसंद नहीं किया है। जबकि ये प्रतीक राष्ट्रीयता को परिभाषित और पुनर्परिभाषित करने में उलझ गए हैं और लोगों को बढ़-चढ़ कर अपने देशभक्ति को सिद्ध करने के लिए कहा गया, बहस अभी जारी रहने की संभावना है।

अनुवादक
राजेश त्रिपाठी