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युद्ध पीड़ित शांति के दूत

(स्रोत : द हिंदू – 26 नवंबर, 2015)

मूल लेखक-Shiv Visvanathan

कभी-कभी जब आप एक समाचार-पत्र पढ़ते हैं, तो रुककर अपने से यह सवाल करते हैं कि आज क्या खास समाचार है? क्या घटना है? जो विशेष महत्त्व रखती है? जब आप इस सप्ताह की खबर पर दृष्टि डालते हैं इस्लामिक स्टेट की फ्रांस में आतंकी घटना की प्रमुखता से चर्चा, बिहार के चुनाव और इसके बाद की स्थितियों पर भारी भरकम विवरण, ‘बार्सिलोना ने रियल मेड्रिड को हराया’ का भी प्रमुख पृष्ठ पर बराबर का स्थान ग्रहण करने का दावा, फिर भी बहुत-सी घटनाओं का कोई उल्लेख नहीं यहां तक कि कोई टिप्पणी भी नहीं।
हाल ही में बंगलुरू में ‘वुमेन इन ब्लैक’ नामक अंतर्राष्ट्रीय समूह द्वारा एक सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में एकत्रित 30 देशों की महिलाओं ने गवाह के रूप में नरसंहार का और उससे संबद्ध अपने अनुभवों का वर्णन किया कि नरसंहार की घटना के दौरान जीने का क्या मतलब होता है जिसे सुनकर कॉलेज के विद्यार्थियों की स्रोता मंडली हतप्रभ रह गई फिर भी इस सम्मेलन के बारे में शहर और देश में कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया दर्द और प्रतिरोध की कहानी के बाद कहानी प्रस्तुत की गई लेकिन अगले दिन के समाचार में इसके बारे में कोई विवरण नहीं आया, कोई गपशप तक नहीं दिखाई दी, यहां तक कि छोटी सी खबर भी नहीं थी। मैं चुप्पी से हैरान था कि पीड़ितों के हतप्रभ कर देने वाली कहानियों के प्रति शहर कितना उदासीन है।
रहस्यमय चुप्पी-ऐसे नरसंहारों के प्रति उदासीनता भारत को प्रश्नों के घेरे में ला खड़ा करती है एक ओर जहां भारत की ओर से पाकिस्तान और पेरिस के आतंकवाद के संबंध में जोर-जोर से भर्त्सना की जाती है वहीं दूसरी ओर जनसंहारों के प्रति इसकी उदासीनता रहस्यमय है। यह एक विडंबना ही है कि भारत का एक राष्ट्र के रूप में उदय तथा पाकिस्तान का बनना एक बड़े नरसंहार की आधारशिला पर घटित हुआ जिसमें 1 लाख, 60 हजार लोगों की जान गई और 2 करोड़, 30 लाख लोग विस्थापित हुए। इसके कुछ वर्षों पहले ही यह भू-भाग बंगाल के अकाल के कारण जान-माल के व्यापक नुकसान को झेल चुका था जिसमें भुखमरी तथा कुपोषण से 30 लाख लोग काल कवलित हो गए थे। इनके लिए कोई न्यूरेम्वर्ग नहीं था जहां ब्रितानियों को 30 लाख लोगों की मृत्यु का जिम्मेदार मान कर अपराधी घोषित किया जा सके। वस्तुतः इसी अकाल ने भारत में योजनागत विकास की भूमिका तैयार की। एक देश जिसका उदय ही दो नरसंहारों की पृष्ठभूमि में हुआ हो उसमें इन मृतक लोगों की याद में स्मृति स्थल तो बनने ही चाहिए थे लेकिन भारत फिर भी इन सब के प्रति उदासीनता अपना रहा है।
बंगलुरू के इस सम्मेलन में आई कुछ महिलाओं की उम्र तो बहुत ही कम थी और कुछ अपेक्षाकृत उम्रदराज महिलाएं भी शामिल थीं और सभी ने बिना किसी विद्वेष के बलात्कार, गृहहीनता और हिंसा के बारे में अपने अनुभवों को खुलकर बयान किया। ये महिलाएं- आर्मेनिया, इराक, ईरान, अफगानिस्तान, बोस्निया तथा रवांडा आदि देशों से थी और सभी के वृत्तांतों में शारीरिक उत्पीड़न प्रमुख विषय रहा। ऐसा प्रतीत होता है कि नरसंहार और महिलाओं के शारीरिक उत्पीड़न में घनिष्ठ संबंध है।
एक अफगान महिला ने बताया कि बलात्कार किस कदर एक महिला को नापाक कर देता है। यह महिला आगे कहती है कि किस प्रकार शारीरिक उत्पीड़न की शिकार महिला को परिवार में पतित रूप में देखा जाता है और कभी-कभी तो मार डाला जाता है। एक इराकी विदुषी ने तो यहां तक कह डाला कि किस प्रकार अमेरिका निरंकुशता के विरुद्ध युद्धक अभियान के माध्यम से इराक और सीरिया को वहां के उच्च श्रेणी के पेशेवर व्यक्तियों एवं रचनात्मक मध्यम वर्ग से रहित बना रहा है ताकि हिंसा के विरोध को कमजोर किया जा सके। निकासी के कार्यक्रम तो जैसे नरसंहार की तकनीक के नए तरीके बन चुके हैं।
कश्मीर एवं नगालैंड से आए प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आंतरिक युद्ध ने भी किस कदर महिलाओं को प्रभावित किया है, सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम के प्रभाव के रूप में। उन्होंने इरोम शर्मिला और मणिपुर की मांओं के बारे में बात की कि कैसे वे अपने तन को जोखिम में डालकर विरोध की प्रतीक बनीं। किसी ने स्पष्ट किया कश्मीर में अकेले ही प्रति वर्ष 8,00,00 पीड़ितों के मामले सामने आते हैं और स्रोताओं को अचंभित होना पड़ा कि एक सभ्यता के रूप में भारत का आखिरकार मतलब क्या है? महिलाओं ने इस बारे में आक्रोश जाहिर करते हुए तर्कपूर्ण बयान दिए। इनके ये दर्द भरे बयान धीरे-धीरे अब साहस और प्रतिरोध के प्रमाण रूप में उभरकर आए है।
जब कोई इन कहानियों को सुनता है, तो एक के बाद एक व्यापक नरसंहारों के नाम जुड़ते चले जाते हैं जैसे कि आर्मेनिया, रवांडा, बोस्निया शीघ्र ही प्रतीत होता है कि जैसे शरीर के बारे में नया इतिहास लिखा जा रहा हो। शरीर तो जैसे 20वीं एवं 21वीं शताब्दी के इतिहास का केंद्र बन गया है और सामूहिक जन-राजनीति का विनाश। महिला का उत्पीड़न, विकृति एवं यातना तो जैसे नरसंहार से परिपूर्ण समाजों के निरंतर आधार बन गए हैं।
अभी भी ये सिर्फ कहानियों की पुनरावृत्ति मात्र नहीं थी। बारीकियां बदल गईं और कोई भी नरसंहारों की नवीन प्रकृति को महसूस कर सकता है। वर्ष 1930 के दौर में ऐसे व्यापक कत्लेआम बिना किसी लेबल (नाम) के हुए थे और विन्सटन चर्चिल ने इनका वर्णन ‘‘बिना किसी नाम के अपराध’’ के रूप में किया। एक पोलैंड के यहूदी ने जो कभी भाषाशास्त्र का विद्यार्थी रहा था, जेनोसाइड (Genocide) या नरसंहार शब्द की रचना की। यह एक कानूनी शब्द माना गया और इसे राष्ट्रों के संदर्भ में लोगों को खत्म करने हेतु उसी रूप में प्रयुक्त भी किया गया। रफेल लेमकिन के विचारों के संदर्भ में इसका अर्थ राष्ट्र राज्य के युद्ध और हिंसा से लगाया जा सकता है जिसके द्वारा राष्ट्र अपनी संप्रभुता को आबादियों को समाप्त करने में प्रयुक्त करते हैं बजाय इसके कि स्कूलों तथा घरों का निर्माण करा दें।
आज नरसंहार (जेनोसाइड) युद्ध और राष्ट्र राज्य से परे जा चुका है क्योंकि सामूहिक हिंसा और व्यापक उन्मूलन युद्ध से परे जाकर अन्य प्रकार के उन्मूलनों का रूप ले लेता है। आज विकास के निश्चित प्रकार अन्य तरीकों से युद्ध को जारी रखने के कारक बन गए हैं। आज विकास एक एंटीसेप्टिक तकनीकी परियोजना के रूप में उतना ही नरसंहारक हो सकता है, जितना कि युद्ध और रोजमर्रा की जिंदगी के लिए भी उतना ही विघटनकारी।
भारत, जिसने कभी नेहरूवादी सपनों के आधार पर बांधों को आधुनिक भारत के मंदिरों के रूप में देखा था, के पास अब 4 करोड़ से अधिक शरणार्थी, बांधों के कारण हुए विस्थापन से हैं। विडंबना यह है कि भारत में बांधों से विस्थापन के कारण उन युद्धों की तुलना में जो हमने लड़े हैं, कहीं ज्यादा शरणार्थी हैं फिर भी हम विकास को एक विशुद्ध धारणा मानते हैं।
आमतौर पर नरसंहार को आंकड़ों के संदर्भ में समझा जाता है लेकिन जैसा कि एक बार अल्बर्ट कामू ने कहा था कि आंकड़े खून नहीं बहाते हैं लेकिन अवधारणाएं कहीं ज्यादा बुरी हैं ये भले ही निदान करने वाली लगती हैं, वास्तव में ये ही नरसंहारक होती हैं। इनका विवेकहीन प्रयोग आबादियों को समाप्त करने के साथ-साथ प्रकृति और सभ्यताओं को तबाह कर सकता है।
वास्तव में, विडंबना तब और बढ़ जाती है जब हम पाते हैं कि दंगे आज अचानक विस्थापन के सबसे बड़े स्रोत के रूप में 80 लाख से अधिक लोगों से स्थान परिवर्तन का कारण बन जाते हैं। युद्ध से इतर हिंसा के रूप में नरसंहारों की गिनती भयावह है। इसमें कन्या भ्रूण हत्या के स्तर को भी जोड़ना होगा जिसकी संख्या 5,00,000 प्रति वर्ष है। यह आंकड़ा भी एक भयावह कहानी कहता है। भारत में इस प्रकार की मृत्यु संख्या बिना युद्ध के ही एक प्रकार का नरसंहार है। नरसंहार के बारे में एक ऐसी अवधारणा की आवश्यकता है जो युद्ध से परे जाती हो और सामूहिक हिंसा को और अधिक जटिल रूप में देखती हो। हमें यह महसूस करना होगा कि सामाजिक विज्ञान की अवधारणाओं को एक नरसंहार गुणक की आवश्यकता है जो यह गणना कर सके कि वे कितने लोगों को खत्म कर सकते हैं। शैक्षणिक एवं नीतिगत ज्ञान की निर्दोष्ता नहीं है और न ही मूल्य तटस्थता है।
यदि कोई इन महिलाओं के अनुभवों के बारे में सुने तो वह मोदी, ओबामा, ओलांद्रे जैसे नेताओं से इन प्रत्यक्षदर्शियों के मामले में वैचारिक भिन्नता रखेगा। महिलाओं ने परिवारों की बात की, प्रतिरोध के बारे में कहा और एकता का गीत गया। उन्होंने कहानी कहने और स्मृति की बात की। हमारे नेता सुरक्षा और व्यवस्था दंडात्मक युद्ध की बात करते हैं। वे प्रतिक्रिया रूप में हिंसा प्रस्तुत करते हैं। यह एक विरोधाभासी स्थिति है और हमे यूनेस्को चार्टर के महान शब्दों में से एक की याद दिलाती है ‘‘यदि मनुष्यों के दिमाग में युद्ध का प्रारंभ होता है, तो शांति की सुरक्षा का निर्माण मनुष्यों के दिमाग में ही होना चाहिए।’’ महिलाओं ने इसे लिंगीय मोड़ देकर व्यक्त किया कि ‘‘यदि पुरुषों के दिमाग में युद्ध का प्रारंभ होता है, तो शांति की सुरक्षा का निर्माण महिलाओं के दिमाग में होना चाहिए।’’ यह दिखाई भी दे रहा है कि राष्ट्रों और सुरक्षा को लेकर चिंतित नेताओं के पास संयत आवाजों के लिए समय नहीं है जबकि फ्रांस फट पड़ा है और सीरिया टूट रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा एवं आतंक के प्रति सरकारी प्रतिक्रिया नरसंहार के प्रति हमारी प्रतिक्रिया को कम करती है जिसने इसे प्रति दिन मान्य मामले के रूप में परिणत कर दिया है।
फिर भी इन महिलाओं के संदेश को सुने जाने की आवश्यकता है। उनकी सलाह है कि नरसंहार, सुरक्षा की चिंता के प्रति अधिकारिक उत्तर अपर्याप्त हैं। यह राष्ट्रों, निगमों, सेनापतियों और यहां तक कि सुरक्षा चिंतकों को बेदाग छोड़ देता है। ये वे साधारण लोग, गैर-सरकारी संस्थाएं, महिलाओं के समूह, आध्यात्मिक नेता, व्यापार संगठन जैसे सेवा (SEWA), पर्यावरण मंच जो स्थिरता का सपना देख रहे हैं और इन्हें ही शांति के नए चिंतन का नेतृत्व करना है। शांति युद्ध की अनुपस्थिति मात्र ही नहीं है कुछ और अधिक है और अहिंसा के सिद्धांत के रूप में सिलिकन घाटी की तुलना में कहीं अधिक नवीन क्षेत्रों में उत्पन्न की जानी है।
इस दिन के प्रस्तुतीकरण से मुझे यह अनुभव हुआ कि भारत ने युद्ध, सुरक्षा, विकास और आतंक के बारे में बहुत कुछ कहा है लेकिन शांति के बारे में कोई सक्रिय सिद्धांत नहीं है। यह ठीक उसी तरह से है जैसे कि नए प्रबंधकीय तंत्र एवं कार्यप्रणाली से युक्त हमारे तकनीकी उच्च वर्ग शांति को निष्क्रियता के प्रतीक के रूप में मानते हों ‘वूमन इन ब्लैक’ एवं अन्य शांति प्रयास शांति को पुनः कार्यसूची में लाने की तलाश में लगे हुए हैं और जो कुछ भी उनके पास है वह है उनका शरीर, उनका मौन, उनकी पवित्रता और शांति की ध्वनियों को सुनने के लिए संसार से, मांगों भरी आवाज। अब समय आ गया है जब भारत को इस आवाज को सुनना है और सुनकर उस दिशा में कुछ करे।

अनुवादक
राजेश त्रिपाठी