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म्यांमार के लिए एक बड़ा कदम

(स्रोत : द टाइम्स ऑफ इंडिया : 2 अप्रैल, 2016)

मूल लेखक- राजीव भाटिया

इस सप्ताह म्यांमार ने अपनी लोकतंत्र की यात्रा में एक नए चरण की शुरुआत की है। यू हतिन क्याव, जो एक पूर्व राजनैतिक बंदी हैं, ने 30 मार्च को नए राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। साहसी और बहुचर्चित पूर्व कैदी आंग-सान सू-की नए मंत्रिमंडल में प्रधान संरक्षक के रूप में नियुक्त की गई। उनके पास चार महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों (विदेशी मामले, शिक्षा, ऊर्जा और राष्ट्रपति कार्यालय) तथा राष्ट्र को नेतृत्व देने की संपूर्ण जिम्मेदारी है। मंत्रिमंडल में सेना के मुखिया मिन आंग लैंग (Min Aung Hlaing) द्वारा नामित तीन लेफ्टिनेंट जनरल सम्मिलित हैं।
कल के राजनैतिक विरोधी अब सरकार में भागीदार हैं। सेना ने देश पर वर्ष 1962 से शासन किया है। अब शक्ति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा लोगों द्वारा चुने गए नेताओं की ओर हस्तांतरित हो गया है। यह प्रजातांत्रिक शासन की ओर एक लंबी छलांग है। वर्ष 2010 के चुनावों से प्रारंभ हुई संक्रमण की प्रक्रिया ने, गत नवंबर में हुए चुनावों में ‘नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी’ (NLD) की अपूर्व सफलता के कारण तीव्र गति ग्रहण कर ली है।
क्या यह नया सवेरा है? निश्चित रूप से परिवर्तन को कम करके नहीं आंका जा सकता। एन.एल.डी., जिसका अब संसद के दोनों सदनों पर नियंत्रण है, के पास काफी अधिक संख्या में मंत्रिमंडलीय पद हैं और इसने प्रदेशों में मुख्यमंत्रियों को भी नामित किया है। यह राष्ट्र के लिए बोलेगी लेकिन ये सेना के साथ सत्ता की साझेदारी में है।
सेना, जिसने वरिष्ठ उपराष्ट्रपति, तीन महत्त्वपूर्ण मंत्री (गृह, सुरक्षा तथा सीमा मामले) प्रदान किए हैं, 25 प्रतिशत सांसदों का नियंत्रण करती है और संविधान द्वारा अधिकृत की गई राजनैतिक भूमिका के निर्वहन हेतु प्रतिबद्ध है। म्यांमार की राजनीति एक दो चालकों वाली कार की तरह प्रतीत होती है।
यदि दोनों राजनैतिक भागीदार एन.एल.डी. तथा सेना पूर्ण सहयोग करते हैं, तो वे राष्ट्र को एक नई शुरुआत की ओर ले जाने में नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं। म्यांमार के सभी शुभचिंतकों को उसके लिए यही शुभकामना करनी चाहिए।
भला हो भूतपूर्व राष्ट्रपति थीन शीन (Thein-Sein) द्वारा शुरू किए गए सुधारों का जिससे कि राष्ट्र प्रत्यक्ष रूप से वर्षों के कुशासन, गरीबी, विद्रोहों और झगड़ों से उबर रहा है। परिवर्तनों का शुभारंभ सेना ने ही भूतकाल में लिए गए अपने गलत निर्णयों और असफलताओं से सीख लेकर किया है और शेष कार्य लोगों ने लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर कर दिया।
वर्ष 1990 के बाद से हुए इन प्रथम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के माध्यम से उन्होंने एक शक्तिशाली संदेश दिया है। सेना ने इसे तीव्रता और स्पष्ट रूप से स्वीकार किया।
अपने शपथ ग्रहण समारोह के बाद एक संक्षिप्त वक्तव्य में हतिन क्याव ने चार मुख्य उद्देश्यों को चिह्नित किया है-राष्ट्रीय सुलह, आंतरिक शांति, संवैधानिक सुधार और देश के नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार। वर्तमान संविधान के आधार पर शपथ लेते हुए उन्होंने जोर दिया कि यह हमारे देश के प्रजातांत्रिक मानदंडों के अनुरूप होना चाहिए। इस उद्देश्य की प्राप्ति में सेना की ओर से कुछ प्रतिरोध आने की भी संभावना है।
नई सरकार कठिन चुनौतियों का सामना कर रही है। इनमें से बहुतों-जैसे जातीय संघर्ष, बौद्ध-मुस्लिम तनाव, रोहिंग्या समस्या आदि, का संतुष्टिपूर्ण हल प्राप्त करने में समय लगेगा। इनसे एन.एल.डी. के राजनैतिक चातुर्य का भी परीक्षण होगा।
अन्य समस्याएं और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं : संवैधानिक सुधारों की संरचना, सामुदायिक आर्थिक विकास में गति, प्रशासनिक सुधारों को लागू करना और एक ऐसे तंत्र की संरचना जो संसद, सरकार और सेना को एक सूत्र में पिरो सके। अंतिम कार्य असाधारण रूप से महत्त्वपूर्ण है। एन.एल.डी. द्वारा दृढ़ता और धैर्य तथा सेना की ओर से लचीला रवैया अपनाने मात्र से ही म्यांमार आगे बढ़ने की आशा कर सकता है।
यह देखना भी दिलचस्प होगा कि कैसे सरकार अपनी विदेश नीति का संचालन करती है। इस नीति के दृष्टिकोण में एन.एल.डी. तथा सेना का मिश्रित वैश्विक नजरिया दिखाई पड़ सकता है।
यह मिश्रण प्रक्रिया वर्तमान क्षेत्रीय संदर्भों में होगी जबकि पूर्वी एशिया, अमेरिका और चीन के बीच रणनैतिक युद्ध की तीव्रता महसूस कर रहा है।
सेना के विरुद्ध अपने लंबी लड़ाई में सू-की को पश्चिम से बहुमूल्य सहायता मिली जबकि जनरलों, जिन्हें अधिकांश देशों ने परित्यक्त किया, को चीन से मूल्यवान सहयोग प्राप्त हुआ। राष्ट्रपति थीन-शीन ने सृजनात्मक मध्यम मार्ग को पिछले पांच वर्षों में अपनाया। उन्होंने अमेरिका, जापान तथा अन्य राष्ट्रों के साथ सकारात्मक रिश्ते कायम किए जबकि चीन समीकरण को दृढ़ता और लचीलेपन के दुर्लभ मिश्रण द्वारा पुनर्निर्मित किया। यह क्रम संभावित रूप से जारी रहेगा, लेकिन चीन-म्यांमार रिश्तों की मजबूती के लिए प्रारंभिक प्रयासों की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है।
अपनी पार्टी की पूर्व तकलीफों पर विजय पाने के बाद, अब म्यांमार की नई विदेश मंत्री सू-की एशियाई नेताओं के साथ सहयोगात्मक संबंधों की कामना कर सकती हैं।
सेना द्वारा शासित म्यांमार के एशियान के साथ-साथ सृजनात्मक संबंध एन.एल.डी. को पसंद नहीं थे। एशियाई नेता अब नए नेतृत्व से मिलना चाहते हैं और संबंध विकसित करने के लिए तैयार हैं।
सू-की व्यापक रूप से भारत की मित्र के रूप में जानी जाती हैं जो गांधी के दर्शन में विश्वास रखने वाली तथा जवाहरलाल नेहरू की प्रशंसक हैं। उनके म्यांमार की सत्ता में होने से भारत-म्यांमार के रिश्ते सामान्य क्रम में पनपने चाहिए।
ऐसी आशा की जा रही है कि वह स्वर्णयुग पुनः लौट सकता है जो वर्ष 1950 में अस्तित्व में था।
एक अलग दृष्टिकोण यह है कि जब म्यांमार प्रशासन के दो मार्गों के साथ प्रयोग कर रहा है भारत को केवल देखना और प्रतीक्षा करनी चाहिए। फिर भी विचारशील विशेषज्ञ यह स्पष्ट करते हैं कि म्यांमार की शिथिल नीति आत्मघाती साबित होगी। इन सबके बावजूद भारत की अपने पूर्वी पड़ोसी के साथ विशिष्ट हिस्सेदारी है और ये अपने स्वयं के कारणों से भारत का सक्रिय सहयोग चाहता है। अतः यही समय है कि नई दिल्ली, म्यांमार से रिश्तों के उन्नयन के लिए क्रमवार प्रयासों का खुलासा करे। इसके अंतर्गत उच्चस्तरीय द्विपक्षीय यात्रा शीघ्रातिशीघ्र की जानी चाहिए, एक वार्षिक सम्मेलन के लिए समझौता हो, एक नया और उदार विकास पैकेज लाया जाए, एक नए प्रयत्न के साथ, सिविल सोसायटी की सहायता के लिए दृढ़ अभियान चलाने हेतु भारतीय मीडिया को उत्प्रेरित किया जाए और लोगों से लोगों के संबंधों में विस्तार हो। इसी के साथ-साथ सेना के साथ भी संप्रेषण तथा सहयोग जारी रहना चाहिए।
जब अवसर दस्तक देता है, तो बुद्धिमत्ता इसी में है कि इसका स्वागत एक गहरी योजना के साथ किया जाए।

अनुवादक
राजेश त्रिपाठी