बराक ओबामा की भारत यात्रा

65वर्ष पहले 26 जनवरी, 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 21 तोपों की सलामी के बाद भारत के राष्ट्रीय ध्वज को फहरा कर भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्म की घोषणा की थी। एक ब्रिटिश उपनिवेश से एक संप्रभुतापूर्ण, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत के उदय की यह ऐतिहासिक घटना थी। उल्लेखनीय है कि किसी गणतंत्र (Republic) में संविधान सर्वोच्च होता है जबकि प्रजातंत्र (Democracy) में जनता। किसी गणतंत्र में बहुसंख्यक, केवल बहुमत के आधार पर किसी व्यक्ति, समाज या अल्पसंख्यक समुदाय के मूलभूत अधिकारों के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते। गणतंत्र में निर्वाचित सरकार के अधिकार संविधान की सीमाओं से बंधे होते हैं। नागरिकों की स्वीकृति से ही संविधान को अपनाया जाता है और इसे केवल जनता के प्रतिनिधियों द्वारा विभिन्न नियमों के तहत संशोधित किया जा सकता है। इसके विपरीत ‘पूर्ण प्रजातंत्र’ (Pure Democracy) में बहुमत निरंकुश और सर्वशक्तिमान होता है। बहुमत के विरुद्ध अल्पमत को कोई संरक्षण नहीं होता। भारत एक ऐसा देश है जो गणतांत्रिक भी है और प्रजातांत्रिक भी। जबकि नॉर्वे, डेनमार्क, नीदरलैंड्स, स्वीडन जैसे देश प्रजातांत्रिक तो हैं परंतु गणतांत्रिक नहीं। चीन, क्यूबा, उत्तर कोरिया जैसे कई देश भी हैं, जो गणतांत्रिक तो हैं परंतु प्रजातांत्रिक नहीं हैं।
वर्तमान में विश्व के 206 संप्रभु राष्ट्रों में से 135 देश आधिकारिक रूप से अपने नाम के साथ ‘रिपब्लिक’ शब्द का प्रयोग कर रहे हैं।
प्रत्येक गणतांत्रिक राष्ट्र की तरह भारत भी अपने गणतंत्र दिवस अर्थात 26 जनवरी के अवसर पर प्रत्येक वर्ष एक भव्य समारोह आयोजित करता है। इस दिन रायसीना हिल्स स्थित राष्ट्रपति भवन से राजपथ होते हुए इंडिया गेट स्थित अमर जवान ज्योति तक एक परेड होती है। इसके तीन दिन बाद 29 जनवरी को ‘बीटिंग रिट्रीट’ (Beating Retreat) समारोह आयोजित होता है जिसमें भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना के बैंड पारंपरिक धुन बजाते हुए मार्च करते हैं। इस प्रकार गणतंत्र दिवस समारोह की औपचारिक समाप्ति होती है।
भारत के राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस के अवसर पर आमतौर पर किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष को बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किए जाने की प्रथा काफी पहले से चली आ रही है। शुरू के पांच वर्षों (1950-1954) तक किसी राजकीय अतिथि को आमंत्रित नहीं किया गया था क्योंकि तब तक गणतंत्र दिवस समारोह के आयोजन हेतु कोई स्थायी स्थल तय नहीं हुआ था। यद्यपि वर्ष 1950 में इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णो भारत आए हुए थे, इसलिए उन्हें इस समारोह में बुलाया गया था और वर्ष 1954 में तत्कालीन भूटान नरेश जिग्मे दोरजी वांग्चुक भी भारत में थे, इस कारण वे भी गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल हुए थे। लेकिन वर्ष 1955 से यह प्रथा स्थायी बना दी गई और पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद पहले मुख्य अतिथि के तौर पर राजपथ पर आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह की परेड के गवाह बने। अब तक सर्वाधिक चार-चार बार फ्रांस और भूटान के राष्ट्राध्यक्षों को गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया है। सोवियत संघ/रूस तथा मॉरीशस से भी तीन-तीन बार राजकीय अतिथि भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में शिरकत कर चुके हैं।

  • बराक ओबामा : 66वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथि
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को वर्ष 2015 के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने हेतु आमंत्रित किया था। इस संबंध में मोदी ने ट्वीट (Tweet) किया था कि, ‘‘इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम अपने बीच एक मित्र के साथ होने की आशा करते हैं। मैंने राष्ट्रपति ओबामा को आमंत्रित किया है, ताकि वह इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बनें।’’ प्रधानमंत्री मोदी के इस निमंत्रण को अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया जिसकी पुष्टि अमेरिकी राष्ट्रपति की ‘राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद’ (NSG) ने ट्विटर के माध्यम से ही की।
    उल्लेखनीय है कि सितंबर, 2014 में संपन्न प्रधानमंत्री मोदी की सफल अमेरिका यात्रा के पश्चात ओबामा को यह निमंत्रण दिया गया था। अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने वाशिंगटन में राष्ट्रपति ओबामा के साथ बैठक में भाग लिया था जो अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ उनकी पहली द्विपक्षीय बैठक थी। नवंबर, 2014 में ब्रिसबेन (ऑस्ट्रेलिया) में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन तथा म्यांमार में संपन्न पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन के मौके पर भी मोदी तथा ओबामा की मुलाकात हुई थी।
  • ओबामा की सद्यः भारत यात्रा (25-27 जनवरी, 2015)
    अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपनी पत्नी मिशेल ओबामा के साथ 25-27 जनवरी, 2015 के मध्य भारत के राजकीय दौरे पर रहे। ओबामा अमेरिका के पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में दो बार भारत का दौरा किया है। उल्लेखनीय है कि इसके पूर्व ओबामा 6-9 नवंबर, 2010 के दौरान भारत के राजकीय दौरे पर रहे थे।
    तय कार्यक्रम के तहत 25 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत की राजधानी नई दिल्ली पहुंचे जहां उनका स्वागत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। इसके पश्चात राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में ओबामा का स्वागत किया जहां अमेरिकी राष्ट्रपति ने 21 बंदूकों की सलामी ली और पारंपरिक स्वागत के दौरान भारतीय वायु सेना की विंग कमांडर पूजा ठाकुर के नेतृत्व में दिए गए ‘गॉर्ड ऑफ ऑनर’ (Guard of Honour) का निरीक्षण किया। उल्लेखनीय है कि भारत की सशस्त्र सेना के इतिहास में ‘गॉर्ड ऑफ ऑनर’ रस्म की अगुवाई पहली बार किसी महिला अधिकारी ने की। इसके पश्चात उन्होंने राजघाट जाकर महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि भी अर्पित की। राष्ट्रपति ओबामा एवं प्रधानमंत्री मोदी के मध्य दिल्ली के हैदराबाद हाउस में पहले व्यक्तिगत एवं फिर प्रतिनिधिमंडल स्तर पर द्विपक्षीय वार्ता संपन्न हुई, जिसके बाद दोनों नेताओं ने संयुक्त रूप से पत्रकार-वार्ता को संबोधित किया। इसके पश्चात ओबामा ने शाम को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा उनके सम्मान में आयोजित रात्रिभोज में भी शामिल हुए।
    26 जनवरी को भारत के राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री ने 66वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में अमेरिकी राष्ट्रपति का स्वागत किया। उल्लेखनीय है कि वह इस ऐतिहासिक समारोह की शोभा बढ़ाने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। ओबामा ने गणतंत्र दिवस परेड का अवलोकन किया। इसके बाद वे भारत के राष्ट्रपति द्वारा आयोजित ‘ऐट होम’ (At Home) में शामिल हुए। इसके पश्चात उन्होंने होटल ताज पैलेस के ‘दरबार हाल’ में आयोजित ‘भारत-यूएस सीईओ मंच बैठक’ (India-US CEO Forum) में भाग लिया। इस बैठक के अलावा वे फिक्की (FICCI) और सीआईआई (CII) के सहयोग से भारत-अमेरिका व्यवसाय परिषद एवं भारत सरकार के औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग द्वारा आयोजित ‘भारत-यूएस व्यवसाय शिखर बैठक’ (India-U.S. Business Summit) में भी शामिल हुए।
    27 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने दिल्ली के सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में लोगों को संबोधित किया। इसी दिन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा और प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ नामक रेडियो कार्यक्रम के माध्यम से एक साथ देश के लोगों को संबोधित किया। उल्लेखनीय है कि किसी भारतीय प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति का यह पहला संयुक्त रेडियो संबोधन भी है। इसके बाद 27 जनवरी को ही अपनी यात्रा के अगले चरण के लिए ओबामा दिल्ली से ‘सउदी अरब’ की राजधानी रियाद के लिए रवाना हो गए।
  • संयुक्त वक्तव्य के मुख्य अंश
    संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सामरिक, आर्थिक, वैज्ञानिक तथा अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर व्यापक विचार-विमर्श के पश्चात 59 बिंदुओं वाला एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया। संयुक्त वक्तव्य ‘साझा प्रयास-सबका विकास’ (Shared Effort; Progress for All) शीर्षक से 25 जनवरी, 2015 को हैदराबाद हाउस में जारी किया गया। संयुक्त वक्तव्य के मुख्य अंश निम्नवत हैं-
  • राष्ट्रपति ओबामा तथा प्रधानमंत्री मोदी ने यह सुनिश्चित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता की फिर से पुष्टि की कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार में साझेदारियां 21वीं शताब्दी में समग्र द्विपक्षीय भागीदारी का एक महत्त्वपूर्ण घटक हैं। इस प्रयोजन के लिए, दोनों नेता विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार के अनेक क्षेत्रों में सहयोगी प्रयासों का विकास जारी रखने पर सहमत हुए जिसमें मानव स्वास्थ्य एवं कल्याण पर जल एवं वायु प्रदूषण, सेनिटेशन एवं साफ-सफाई के प्रभावों का अध्ययन शामिल है।
  • दोनों नेताओं ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंडा (GHSA) के लिए अपनी-अपनी प्रतिबद्धता की फिर से पुष्टि की तथा संक्रामक बीमारियों का फैलाव रोकने के लिए देश एवं विदेश में विशिष्ट कार्रवाइयों की घोषणा की जिसमें एक सीडीसी-स्वास्थ्य मंत्रालय इबोला तथा जीएचएसए तत्परता प्रशिक्षण, भारतीय महामारी आसूचना सेवा का विस्तार तथा तीन साल के अंदर जीएचएसए के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए एक रोडमैप का विकास शामिल है।
  • दोनों नेता स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान, विकास, विनिर्माण एवं तैनाती पर अपनी साझेदारी का विस्तार करने के लिए सहमत हुए हैं। राष्ट्रपति ओबामा ने भारत के महत्त्वाकांक्षी 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा कार्यक्रम में भागीदारी करने में अमेरिका की रुचि को व्यक्त किया है।
  • विशाखापट्टनम, इलाहाबाद और अजमेर को स्मार्ट शहरों के रूप में विकसित करने में सहायता के लिए आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की राज्य सरकारों तथा यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड एंड डेवलपमेंट एजेंसी (यूएसटीडीए) के बीच 3 एमओयू (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।
  • दोनों नेताओं ने भारत-यूएस असैन्य अंतरिक्ष संयुक्त कार्य समूह के माध्यम से अंतरिक्ष सहयोग बढ़ाने की दिशा में सतत प्रगति का स्वागत किया।
  • राष्ट्रपति ओबामा ने रक्षा क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश नीति व्यवस्था को उदार बनाने संबंधी प्रधानमंत्री मोदी की पहलों का स्वागत किया तथा दोनों नेता भारत में एक रक्षा औद्योगिक बेस स्थापित करने के लिए भारत के प्रयासों में सहयोग करने पर सहमत हुए जिसमें मेक इन इंडिया जैसी पहलों के माध्यम से सहयोग भी शामिल हैं।
  • दोनों नेताओं ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG), मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (MTCR), ऑस्ट्रेलिया समूह तथा वासेनार व्यवस्था में भारत के चरणबद्ध प्रवेश के लक्ष्य की दिशा में संयुक्त रूप से काम करने के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
  • दोनों नेताओं ने भारत, अमेरिका रक्षा संबंध हेतु वर्ष 2015 की रूपरेखा को हाल ही में अंतिम रूप दिए जाने का स्वागत किया, जो अगले 10 वर्षों तक द्विपक्षीय रक्षा एवं सामरिक साझेदारी का मार्गदर्शन एवं विस्तार करेगी।
  • रक्षा प्रौद्योगिकी एवं व्यापार पहल (डीटीटीआई) के तहत पथ-प्रदर्शक परियोजनाओं के रूप में निम्न चार परियोजनाओं पर सहमति हुई है : (1) अगली पीढ़ी के रावेन मिनिस यूएवी, (2) सी-130 के लिए रोल ऑन रोल ऑफ किट्स, (3) मोबाइल इलेक्ट्रिक हाइब्रिड पावर सोर्स, (4) यूनीफार्म इंटीग्रेटेड प्रोटेक्शन इंसेबल इंक्रीमेंट-2।
  • उल्लेखनीय है कि एयरक्रॉफ्ट कैरियर टेक्नोलॉजी, साझा करने एवं डिजाइन करने तथा जेट इंजन प्रौद्योगिकी के विकास में संभावनाओं का पता लगाने हेतु एक कार्य समूह के गठन पर भी सहमति हुई है।
  • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) को तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए USAID तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय के बीच संयुक्त मंशा घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर। इसकी शुरुआत IIT गांधीनगर से होगी।
  • भारतीय रेल अवसंरचना को संवर्धित एवं उसका सुधार करने में प्रौद्योगिकी सहयोग की संभावना को देखते हुए दोनों नेता यूएस व्यापार एवं विकास एजेंसी तथा भारतीय रेल के बीच तकनीकी सहयोग को सुगम बनाने पर सहमत हुए।
  • दोनों नेता भारत के महत्त्वाकांक्षी‘डिजिटल इंडिया कार्यक्रम’को लागू करने में सहयोग करने तथा वाणिज्यिक सहयोग का विस्तार करने के लिए सहमत हुए जिसमें सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निवेश भागीदारी को प्रोत्साहित करना शामिल है।
  • दोनों पक्ष आतंकवाद, स्वापक पदार्थ, दुर्व्यापार, वित्तीय एवं आर्थिक जालसाजी एवं साइबर अपराध से निपटने हेतु परस्पर सहयोग के लिए सहमत हुए हैं।
  • राष्ट्रपति ओबामा तथा प्रधानमंत्री मोदी ने जलवायु परिवर्तन के संबंध में गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने वर्ष 2015 में पेरिस में एक महत्त्वाकांक्षी जलवायु करार को पूरा करने के लिए साथ मिलकर अन्य देशों के साथ काम करने के महत्त्व पर भी जोर दिया।
  • राष्ट्रपति ओबामा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन हेतु अपने समर्थन की फिर से पुष्टि की जिसमें भारत एक स्थायी सदस्य होगा।
  • 123 करार के कार्यान्वयन की दिशा में हुई प्रगति
    भारत और अमेरिका के मध्य ‘123 समझौता’ (123 Agreement) अक्टूबर, 2008 में हस्ताक्षरित हुआ था। 123 समझौते को ‘भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग करार’ (India-US Civil Nuclear Co-operation Agreement) के नाम से भी जाना जाता है। चूंकि यह समझौता ‘अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1954’ (United States Atomic Energy Act of 1954) के अनुच्छेद 123 के प्रावधानों के तहत हुआ था, इसलिए इसे 123 समझौता कहा गया। समझौते के तहत भारत अपने सैन्य तथा असैन्य परमाणु संयंत्रों को अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत करके सभी असैन्य परमाणु संयंत्रों को ‘अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी’ (IAEA) की निगरानी के दायरे में लाने पर सहमत हुआ था। बदले में अमेरिका भारत के साथ पूर्ण असैन्य नाभिकीय सहयोग स्थापित करने की दिशा में कार्य करने पर सहमत हुआ था।
    हालांकि इस समझौते को हस्ताक्षरित हुए 6 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है परंतु अभी तक इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका है। समझौते के पूर्ण रूप से लागू होने की दिशा में सबसे बड़ी बाधा भारत के ‘‘परमाणु क्षति हेतु नागरिक उत्तरदायित्व अधिनियम, 2010’’ (The Civil Liability for Nuclear Damage Act, 2010) के कुछ प्रावधान हैं, जिन पर अमेरिका को आपत्ति है। असल में, भारत-अमेरिका परमाणु करार के बाद ऐसा कानून बनाना जरूरी हो गया था जिससे परमाणु संयंत्र में दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी तय की जा सके। इसी के चलते ‘परमाणु क्षति हेतु नागरिक उत्तरदायित्व अधिनियम, 2010’ अस्तित्व में आया। इस अधिनियम में दुर्घटना की स्थिति में परमाणु संयंत्र के संचालक (Operator) के साथ उसके निर्माण में प्रयुक्त उपकरणों आदि की आपूर्ति करने वालों (Suppliers) को भी जिम्मेदार ठहराने का प्रावधान है। अधिनियम की विवादास्पद धारा 17(b) में स्पष्ट उल्लिखित है कि अगर निर्माण में प्रत्यक्ष या परोक्ष खराबी होने से कोई परमाणु दुर्घटना होती है तो संचालक को आपूर्तिकर्ता से किसी भी तरह के मुआवजे (Compensation) की मांग करने का अधिकार है। अमेरिका सहित अन्य विदेशी रिएक्टर आपूर्तिकर्ताओं ने मुआवजे के इस प्रावधान पर कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके अतिरिक्त 123 करार के कार्यान्वयन के लिए प्रशासनिक व्यवस्था के मुद्दे पर भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद था। अमेरिका भारतीय नाभिकीय रिएक्टरों पर निगरानी चाहता था जो भारत को मंजूर नहीं था। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मध्य 25 जनवरी, 2015 को हुई बैठक में इन दो बकाया मुद्दों पर कई वर्षों से जारी गतिरोध दूर हो गया और इनको लेकर सहमति बन गई।
    अब, भारत और अमेरिका नाभिकीय दुर्घटना की स्थिति में आपूर्तिकर्ताओं (Suppliers) को कवर प्रदान करने के लिए एक 1500 करोड़ रुपये के ‘भारतीय नाभिकीय बीमा पूल’ (Indian Nuclear Insurance Pool) के निर्माण पर सहमत हो गए हैं। यह एक प्रकार का ‘जोखिम अंतरण तंत्र’ (Risk Transfer Mechanism) है जिसका गठन ‘जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया’ तथा भारत में सामान्य बीमा कारोबार में संलग्न सार्वजनिक क्षेत्र के चार अन्य उपक्रमों यथा न्यू इंडिया एश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड तथा यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है। ये कंपनियां साथ मिलकर इस पूल में 750 करोड़ रुपये का योगदान करेंगी तथा शेष राशि का योगदान सरकार द्वारा टेपरिंग (Tapering) आधार पर किया जाएगा। मुख्य बात यह है कि यह संचालकों एवं आपूर्तिकर्ताओं दोनों के लिए एक ‘पूर्ण जोखिम प्रबंधन समाधान’ (Complete Risk Management Solution) है तथा इससे कोई अनुचित वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा।
  • निष्कर्ष
    निष्कर्षतः अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की भारत-यात्रा एक ऐतिहासिक यात्रा है जो दोनों देशों के मध्य गहन हो रही सामरिक साझेदारी तथा संबंधों में एक गुणात्मक वृद्धि को रेखांकित करती है तथा इस वजह से इसे 21वीं शताब्दी की प्रमुख साझेदारियों में से एक के रूप में कहा गया है। सामरिक, असैन्य परमाणु, रक्षा, ऊर्जा एवं आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण एवं सारवान परिणाम प्राप्त हुए हैं। असैन्य परमाणु करार के मुद्दे पर पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे गतिरोध को दूर कर दिया है। दोनों देश दो बकाया मुद्दों अर्थात ‘असैन्य परमाणु बाध्यता’ तथा ‘123 करार के कार्यान्वयन के लिए प्रशासनिक व्यवस्था’ पर सहमति स्थापित करने में सफल हुए हैं। जहां तक रक्षा एवं सुरक्षा का संबंध है, दोनों राष्ट्रों ने अगले दस वर्षों के लिए रक्षा रूपरेखा करार को अंतिम रूप दिया है। ऊर्जा के क्षेत्र में भारत व अमेरिका स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान, विकास, विनिर्माण एवं तैनाती पर अपनी साझेदारी का विस्तार करने के लिए सहमत हुए हैं। दोनों देश स्थिर एवं समृद्ध अफगानिस्तान के निर्माण में मिलकर काम करने के लिए सहमत हुए हैं। इन प्रयासों के अंग के रूप में, अमेरिका ने एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग मंच (Asia Pacific Economic Cooperation Forum) में शामिल होने की भारत की रुचि का स्वागत किया है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था एशियाई अर्थव्यवस्था का एक गतिशील अंग है। अगले पांच वर्षों में दोनों देश क्षेत्रीय स्तर की वार्ता को सुदृढ़ करेंगे, तीसरे देशों के साथ अधिक मजबूत, गहन क्षेत्रीय एकीकरण के लिए त्रिपक्षीय परामर्श में निवेश करेंगे, क्षेत्रीय मंचों को सुदृढ़ करेंगे, भागीदारी के लिए अतिरिक्त बहुपक्षीय अवसरों की संभावना की तलाश करेंगे, और ऐसे क्षेत्रों का पता लगाएंगे जहां वे इस क्षेत्र में ऐसी क्षमता का निर्माण कर सकते हैं जिससे सबके लिए समृद्धि एवं दीर्घावधिक शांति का मार्ग प्रशस्त हो।
  • भारत-अमेरिका दिल्ली मैत्री घोषणा
  • 25 जनवरी, 2015 को अमेरिकी राष्ट्रपति के दिल्ली प्रवास के दौरान भारत और अमेरिका की मित्रता पर ‘भारत-अमेरिकी दिल्ली मैत्री घोषणा’ (India-US Delhi Declaration of Friendship) शीर्षक से एक
  • दस्तावेज जारी किया गया। इस घोषणा के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं-
    ‘चलें साथ-साथ’ के नारे के तहत दोनों देशों के संबंधों को व्यापक बनाने वाली घोषणा के साथ पुरानी रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने पर सहमति व्यक्ति की गई।
  • ‘साझा प्रयास, सबका विकास’नारे के तहत स्वीकार किया गया है कि संबंधों को मजबूत बनाने वाले दोनों देशों के प्रत्येक कदम अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय एवं वैश्विक शांति, समृद्धि और आगामी वर्षों के लिए स्थिरता को स्वरूप देने की दिशा में एक कदम है।
  • इस घोषणा में कहा गया है कि दोनों देश अपने-अपने राष्ट्रीय सिद्धांतों और कानूनों को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित बिंदुओं का सम्मान करते हैं-
  • लोकतंत्र, सक्षम प्रशासन और मौलिक स्वतंत्रताओं के जरिए दोनों देशों की जनता के लिए समान अवसर का।
  • एक मुक्त, न्यायपूर्ण, सतत और समावेशी नियम आधारित विश्व व्यवस्था का।
  • द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को मजबूत बनाने के महत्त्व का।
  • राष्ट्रीय, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय प्रयासों से जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को समाप्त करने और नए उपायों को अपनाने के महत्त्व का।
  • सतत समावेशी विकास के दोनों देशों तथा विश्व पर पड़ने वाले लाभकारी प्रभाव का।
  • इसके अतिरिक्त निम्नलिखित बिंदुओं पर इस मैत्री घोषणा के अंग के रूप में प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है-
  • बढ़ती अवधि के साथ नियमित शिखर बैठकों के आयोजन पर।
  • रणनीतिक वार्ता को रणनीतिक एवं वाणिज्यिक वार्ता का दर्जा देने पर।
    उल्लेखनीय है कि रणनीतिक तत्त्वों की अध्यक्षता भारत और अमेरिका के विदेश मंत्री करेंगे और वार्ता के वाणिज्यिक घटकों की अध्यक्षता भारत के वाणिज्य मंत्री एवं अमेरिका के वाणिज्य सचिव द्वारा की जाएगी। यह व्यवस्था पारस्परिक समृद्धि, क्षेत्रीय आर्थिक वृद्धि एवं स्थायित्व को बढ़ाने के लिए वाणिज्यिक और आर्थिक संबंधों के सशक्तिकरण के प्रति दोनों देशों की प्रतिबद्धता दर्शाती है।
  • भारत के प्रधानमंत्री और अमेरिका के राष्ट्रपति तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच हॉटलाइन की स्थापना पर।
  • रणनीतिक महत्त्व की परियोजनाओं पर साझा उद्यम विकसित करने में सहयोग पर।
  • सार्थक सुरक्षा और कारगर आतंकवाद विरोधी सहयोग विकसित करने पर।
  • क्षेत्रीय एवं बहुपक्षीय वार्ता के आयोजन पर।
  • बहुराष्ट्रीय मंचों पर नियमित विचार-विमर्श एवं परामर्श पर।
  • पूरे विश्व में सतत एवं समावेशी विकास बढ़ाने के लिए दोनों देशों के लोगों की मजबूती और उनकी योग्यता का लाभ लेने पर।