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नेपाल में भूकंप

Earthquakes in Nepal

प्रकृति के विविध रूप हैं। प्रकृति के सौम्य और आकर्षक रूप के अलावा इसका एक डरावना चेहरा भी है जिसे हम प्राकृतिक आपदाओं के नाम से जानते हैं। यूं तो ये आपदाएं विश्व के किसी भी भाग में अपना प्रभाव दिखा सकती हैं परंतु उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय इलाकों में इनका प्रकोप अपेक्षाकृत अधिक होता है। ऐसे क्षेत्रों में बाढ़, सूखा, चक्रवात, तड़ित झंझा, भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक आपदाओं का भय सदा ही बना रहता है। प्राकृतिक आपदाओं से व्यापक स्तर पर जनहानि होने के साथ आर्थिक और सामाजिक विकास के भी ठप्प होने का खतरा रहता है। यह आपदाएं प्रचंड एवं त्वरित होने के साथ-साथ अप्रत्याशित भी होती हैं, जिससे अक्सर इनसे बचाव के लिए पहले से व्यापक कार्य-योजना बनाना आसान नहीं होता है।
भूकंप प्राकृतिक आपदा के सर्वाधिक विनाशकारी रूपों में से एक है, जिसके कारण व्यापक तबाही हो सकती है। भूकंप का साधारण अर्थ है, ‘भूमि का कांपना’ अर्थात ‘पृथ्वी का हिलना’। भूकंप पृथ्वी की आंतरिक क्रियाओं के परिणामस्वरूप आते हैं। पृथ्वी के आंतरिक भाग में होने वाली क्रियाओं का प्रभाव उसकी पर्पटी पर भी पड़ता है और उसमें अनेक क्रियाएं होने लगती हैं। जब पर्पटी की हलचल इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि वह चट्टानों को तोड़ देती है और उन्हें किसी भ्रंश के साथ गति करने के लिए मजबूर कर देती है, तब धरती की सतह पर कंपन या झटके उत्पन्न हो जाते हैं, ये कंपन ही ‘भूकंप’ होते हैं। भूकंप का पृथ्वी पर विनाशकारी प्रभाव भूस्खलन धरातल का धंसाव, मानव-निर्मित पुलों, भवनों जैसी संरचनाओं की क्षति या नष्ट होने के रूप में दृष्टिगोचर होता है। वेसे तो भूकंप पृथ्वी पर कहीं भी और कभी भी आ सकते हैं लेकिन इनकी उत्पत्ति के लिए कुछ क्षेत्र बहुत संवेदनशील होते हैं। संवेदनशील क्षेत्र से तात्पर्य पृथ्वी के उन दुर्बल भागों से है जहां बलन और भ्रंश की घटनाएं अधिक होती हैं। इसके साथ ही महाद्वीपीय और महासागरीय सम्मिलन के क्षेत्र, ज्वालामुखी क्षेत्र भी भूकंप उत्पन्न करने वाले प्रमुख स्थान हैं।

  • भूकंप विज्ञान से संबंधित कुछ प्रमुख तथ्य
    भूकंपों का अध्ययन करने वाले विज्ञान को ‘सिस्मोलॉजी’ (Seismology) कहते हैं। किसी भूकंप का परिमाण (Magnitude) उसके द्वारा मुक्त की गई ऊर्जा की माप है। जिस बिंदु पर अचानक उत्सर्जित ऊर्जा गोलाकार भूकंपी तरंगों के रूप में बाहर की ओर सभी दिशाओं में संप्रेषित होती है, उसे भूकंप का ‘उद्गम केंद्र’ या ‘केंद्र’ (Focus) कहते हैं। केंद्र के ठीक ऊपर भूतल पर स्थित स्थान को भूकंप का ‘अधिकेंद्र’ (Epicentre) कहते हैं। भूकंप की तीव्रता तथा इससे होने वाली हानि अधिकेंद्र पर अधिकतम होती है और इससे दूर जाने पर हानि कम हो जाती है।
    भूकंप की तीव्रता मापने के लिए रिक्टर स्केल (Richter Scale), मोमेंट मैग्नीट्यूड स्केल (Moment Magnitude Scale) सहित कई स्केल हैं। हालांकि मोमेंट मैग्नीट्यूड स्केल रिक्टर स्केल से ज्यादा उन्नत और सटीक है।
  • प्लेट विवर्तनिकी तथा भूकंप
    वास्तव में भू-विज्ञान के क्षेत्र में ‘प्लेट विवर्तनिकी’ (Plate Tectonics) सिद्धांत का वही महत्त्व है, जो भौतिकी के क्षेत्र में सापेक्षता के सिद्धांत का, रसायन शास्त्र में डीएनए के रासायनिक आबंधों का और खगोलशास्त्र में बिग-बैंग सिद्धांत का।
    भौगोलिक संदर्भ में एक प्लेट विशाल, कठोर और ठोस चट्टानों की पट्टी होती है। विवर्तनिक का अंग्रेजी पर्याय शब्द ‘टेक्टोनिक’ ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ ‘निर्माण करना’ है। इन दोनों शब्दों को साथ में रखने पर हमें प्लेट विवर्तनिक शब्द प्राप्त होता है, जो पृथ्वी की सतह को प्लेटों से बना हुआ बताता है। प्लेट विवर्तनिकी के सिद्धांत को समझने के लिए पहले हमें पृथ्वी की संरचना को समझना होगा। दरअसल, पृथ्वी की आंतरिक संरचना प्याज के कंद की भांति है। उसमें पांच स्पष्ट उत्केंद्री गोले (ऐसे गोले जिनके केंद्र एक ही बिंदु पर स्थित हैं) हैं। वे बाहर से पृथ्वी के केंद्र की ओर इस क्रम में स्थित हैं- वायुमंडल, भूपर्पटी (Crust), मैंटल (Mantle), बाह्य क्रोड (Outer Core) और आंतरिक क्रोड (Inner Core)। इनमें से हम केवल वायुमंडल और भूपर्पटी से ही प्रत्यक्ष रूप से परिचित हैं, परंतु ये दोनों मिलकर पूरी पृथ्वी के द्रव्यमान का 0.5 प्रतिशत से भी कम भाग बनाते हैं। शेष 99.5 प्रतिशत भाग भूपर्पटी के नीचे छिपा हुआ है। पृथ्वी के उक्त अंगों में से वायुमंडल भूकंप उत्पन्न करने में बिल्कुल भी योगदान नहीं देता। भूकंपों के उद्गम की दृष्टि से केवल भूपर्पटी और मैंटल ही महत्त्वपूर्ण हैं। मैंटल का ऊपरी भाग और भूपर्पटी मिलकर ‘स्थलमंडल’ (लिथोस्फीयर) बनाते हैं। पृथ्वी का स्थलमंडल लगभग दो दर्जन दृढ़ टुकड़ों में विभक्त है। इन टुकड़ों को ‘भूवैज्ञानिक प्लेट’ कहते हैं। इनमें से सात प्लेटें-प्रशांत, अफ्रीकी, यूरेशियाई, उत्तर अमेरिकी, दक्षिण अमेरिकी, हिंद-ऑस्ट्रेलियाई, और अंटार्कटिक बड़ी हैं और शेष छोटी। कुछ विद्वान उत्तर अमेरिकी और दक्षिण अमेरिकी प्लेट को एक ही मानते हुए बड़ी प्लेटों की संख्या छह ही मानते हैं। भिन्न-भिन्न आकृतियों के ये टुकड़े जड़ नहीं हैं, वरन् 75 से 200 किमी. तक मोटे खंड हैं, जो स्थलमंडल के नीचे स्थित दुर्बलतामंडल (एस्थेनोस्फीयर) के गाढ़े तरल पर तैर रहे हैं। इन प्लेटों पर ही सारे महाद्वीप और सागर स्थित हैं। किसी प्लेट पर केवल महाद्वीप स्थित है, तो किसी पर केवल सागर और किसी पर थल और सागर दोनों। ये प्लेटें जब आपस में टकराती हैं या एक-दूसरे से दूर होती जाती हैं अथवा एक-दूसरे में घुस जाती हैं तो थल खंड बनते हैं अथवा थल, सागर में परिवर्तित हो जाते है, पर्वत बनते हैं, भूकंप आते हैं अथवा ज्वालामुखी विस्फोटित होते हैं या अन्य भू-क्रियाएं होती हैं। जब दो महाद्वीपीय प्लेटें आपस में टकराती हैं, तब दोनों ही ऊपर रहती हैं, मैंटल में नहीं धंसती। उनके टकराने से भूपर्पटी ऊपर उठती जाती है और वलित पर्वतों का निर्माण करती है। वास्तव में ऐसा ही भारत की उत्तरी सीमा पर हो रहा है। वहां भारतीय प्लेट यूरेशियाई प्लेट से टकरा रही है। इस क्रिया में भारतीय प्लेट यूरेशियाई प्लेट के नीचे धंसती जा रही है पर वह मैंटल में नहीं धंस रही है इससे वहां भूपर्पटी दोगुनी मोटी हो गई है और फलस्वरूप संसार की सबसे ऊंची पर्वत शृंखला हिमालय का निर्माण हुआ है। वैसे इन दोनों प्लेटों का टकराना अब भी जारी है, इसलिए हिमालय अब भी ऊपर उठता जा रहा है और उस समय तक उठता जाएगा जब तक इन प्लेटों का टकराना जारी रहेगा और उस समय तक हमारे देश के उत्तरी एवं पूर्वोत्तर भागों में भूकंप आते रहेंगे।
  • अप्रैल-2015 भूकंप : नेपाल में भारी तबाही
    मौजूदा समय में भारतीय प्लेट 45 मिमी./वर्ष की दर से उत्तर की तरफ बढ़ रही है। उत्तर की तरफ बढ़ने के क्रम में भारतीय प्लेट यूरेशियाई प्लेट से टकराती है और नीचे की तरफ मुड़ जाती है। प्लेट के मुड़ने वाली जगह पर दरार पैदा होती है, जिसे फॉल्ट लाइन कहते हैं। पूरा हिमालय क्षेत्र फॉल्ट लाइन में स्थित है और ये भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। हिमालयी राष्ट्र नेपाल भी उच्च भूकंपीय जोखिम क्षेत्र में स्थित है। नेपाल के ‘खान एवं भू-विज्ञान विभाग’ (Department of Mines & Geology) द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े के अनुसार, नेपाल में वर्ष 1987 से प्रत्येक वर्ष कम से कम एक बार रिक्टर पैमाने पर 5.0 या उससे अधिक की तीव्रता के भूकंप आते रहे हैं, हालांकि वर्ष 1989 एवं वर्ष 1992 इसका अपवाद रहे हैं जब ऐसी कोई घटना घटित नहीं हुई थी। नेपाल का वर्तमान आपदा डाटाबेस (Disaster Database) यह दर्शाता है कि वर्ष 1971 से 2007 के दौरान 37 वर्षों की अवधि में देश भर में भूकंपों की ऐसी 22 घटनाएं घटित हुईं हैं जिनकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 4.5 से 6.5 के मध्य रही है। पिछली एक सदी के दौरान नेपाल में आए भूकंपों से 11,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है। नेपाल के इतिहास में भूकंप की सबसे विध्वंसक घटना जनवरी, 1934 में घटित हुई थी। मोमेंट मैग्नीट्यूड स्केल पर 8.0 परिमाण के इस भूकंप के कारण 10,600 से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इतनी ही तीव्रता के तीन भूकंप काठमांडू घाटी में 19वीं शताब्दी (वर्ष 1810, 1833 एवं 1836) में भी आए थे। वर्ष 1988 में भी नेपाल को भूकंप की मार झेलनी पड़ी थी। 6.5 परिमाण के इस भूकंप के कारण मुख्यतः नेपाल का पूर्वी हिस्सा प्रभावित हुआ था और 721 लोगों की मृत्यु हो गई थी।
    25 अप्रैल, 2015 को नेपाल में धरती एक बार फिर डोली। नेपाल के समयानुसार, सुबह 11:56 बजे नेपाल में भूकंप के झटके महसूस किए गए। इस भूकंप की तीव्रता मोमेंट मैग्नीट्यूड पैमाने पर 7.8 आंकी गई। इस भूकंप का केंद्र नेपाल की राजधानी काठमांडू के उत्तर-पश्चिम में लगभग 80 किमी. दूर गोरखा जिले में स्थित था। भूकंप पृथ्वी की सतह से मात्र 15 किमी. की गहराई पर उत्पन्न हुआ था। वर्ष 1934 के नेपाल-बिहार भूकंप के बाद नेपाल में आई यह सर्वाधिक भयावह प्राकृतिक आपदा थी। भूकंप का प्रभाव भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, सिक्किम, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में महसूस किया गया। 25 अप्रैल को आए भूकंप की तीव्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके आधे घंटे बाद ही आए आफ्टर-शॉक (After-Shock) की तीव्रता 6.6 थी जो अपने आप में तबाही लाने वाला था। इस आफ्टर-शॉक सहित नेपाल में 25 अप्रैल को ही 4.5 परिमाण या उससे अधिक (मोमेंट मैग्नीट्यूड स्केल पर) के 35 से अधिक आफ्टर-शॉक महसूस किए गए। संयुक्त राष्ट्र के आकलन के अनुसार, 25 अप्रैल को आए भूकंप के कारण नेपाल की लगभग 8 मिलियन जनसंख्या प्रभावित हुई है, जो कि नेपाल की कुल जनसंख्या का लगभग एक-तिहाई है। भूकंप ने नेपाल के 75 में से 39 जिलों को प्रभावित किया है। 25 अप्रैल को आए भूकंप के कारण काठमांडू में स्थित 19वीं सदी का नौमंजिला धरहरा टॉवर (Dharahara Tower) पूर्णतः धराशायी हो गया। वर्ष 1832 में नेपाल के मुख्तियार (प्रधानमंत्री के समकक्ष) भीमसेन थापा द्वारा बनवाया गया यह टॉवर एक प्रतिष्ठित स्मारक था जिसकी ऊंचाई 61.88 मीटर (203 फीट) थी। भूकंप से यूनेस्को विश्व विरासत स्थल में शुमार काठमांडू का दरबार चौक (Durbar Square) भी क्षतिग्रस्त हुआ है। नेपाल के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 25 अप्रैल को आए भूकंप के कारण 8600 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है जबकि 19000 से अधिक लोग घायल हुए हैं।
    25 अप्रैल के भूकंप में हुई बर्बादी के घाव अभी हरे ही थे कि 12 मई, 2015 को दोबारा धरती कांप उठी। इस बार भी भूकंप का केंद्र नेपाल में था और इस बार भी झटके पूर्वी और उत्तरी भारत तक महसूस किए गए। नेपाल के समयानुसार, दोपहर 12 :50 बजे आए इस भूकंप की तीव्रता मोमेंट मैग्नीट्यूड स्केल पर 7.3 दर्ज की गई। भूकंप का अधिकेंद्र नेपाल के दो जिलों यथा दोलखा एवं सिंधुपाल चौक की सीमा पर स्थित था।
  • ऑपरेशन मैत्री एवं ऑपरेशन संकटमोचन
    25 अप्रैल को नेपाल में आए भूकंप की भीषण विभीषिका से आहत भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुरंत अपने मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाई और निर्णय लिया कि भारत और पड़ोसी देश नेपाल में हुई तबाही पर त्वरित कार्रवाई करने की जरूरत है। इस संदर्भ में भारतीय सेना ने नेपाल की मदद के लिए राहत और बचाव अभियान प्रारंभ किया और उसे ‘ऑपरेशन मैत्री’ (Operation Maitri) नाम दिया। भारतीय वायुसेना का सी-130 जे हर्क्यूलिस ऐसा पहला विमान था जो 25 अप्रैल को नेपाल में भूकंप के झटके महसूस किए जाने के 4 घंटे के अंदर ‘राष्ट्रीय आपदा मोचन बल’ (NDRF : National Disaster Response Force) के 39 जवानों और 3.5 टन राहत सामग्री के साथ काठमांडू में लैंड हुआ। नेपाल में संचालित किए गए राहत एवं बचाव अभियान में भारतीय वायुसेना द्वारा IL-76, V-17, AN-32 तथा MI-17 विमानों का भी प्रयोग किया गया। नेपाल में राहत एवं बचाव कार्य में लगे भारतीय वायु सेना के अधिकारियों एवं जवानों का नेतृत्व करने एवं उन्हें निर्देशित करने के लिए एक एयर वाइस मार्शल को नेपाल में तैनात किया गया।
    नेपाली सेना ने भी 25 अप्रैल के भूकंप के पश्चात अन्य सुरक्षा एजेंसियों के साथ ऑपरेशन संकटमोचन नामक राहत एवं बचाव कार्य संचालित किया। इस अभियान में नेपाली सेना ने अपने 90 प्रतिशत सैन्य दल को तैनात कर दिया। नेपाली सेना के इस अभियान में विश्व के 30 देशों ने भी सहयोग प्रदान किया।
    15 मई, 2015 को संयुक्त राष्ट्र ने भारत द्वारा प्रायोजित एक प्रस्ताव पारित कर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वह भूकंप प्रभावित नेपाल को तत्काल सहायता के साथ देश के पुनर्निर्माण में मदद करे। 193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष सत्र में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया। इस प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अगले तीन महीनों में 42 करोड़ 30 लाख डॉलर से अधिक राशि एकत्र करने में मदद करने की अपील की है ताकि नेपाल में आए भूकंप में जीवित बचे लोगों की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी की जा सकें। भारत ने नेपाल संबंधी इस प्रस्ताव को पेश किया तथा बांग्लादेश, अफगानिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, जापान, चीन, जर्मनी, श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान, यूके तथा अमेरिका सहित 65 देशों ने इसे सह-प्रायोजित किया।
    संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की-मून ने कहा कि नेपाल में राहत, पुनर्वास और निर्माण कार्य ऐसे होने चाहिए जो टिकाऊ हों और भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं से या तो बचा सकें या होने वाले नुकसान को कम कर सकें।