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नीति आयोग : उम्मीदों-अपेक्षाओं का संस्थान

नई सरकार के पहले नववर्ष के अवसर पर नए संस्थान ‘नीति आयोग’ (NITI Ayog) का गठन किया गया। 1 जनवरी, 2015 को नया संस्थान योजना आयोग के स्थान पर अस्तित्व में आया जिसे इसी दिन समाप्त घोषित कर दिया गया। जहां जन्म है, वहां मृत्यु है। जहां उद्भव है, वहां अवसान है। लेकिन दर्शन के अनुसार कुछ अविनाशी भी होता है, यह जन्म से पहले भी अस्तित्व में रहता है और मृत्यु के बाद भी बना रहता है। सारे रूपांतरण, सारे रूपों के पीछे एक अरूप भी होता है। योजना आयोग और नवरूपांतरित नीति आयोग के पीछे भी एक अरूप है। वह है, देश के विकास का उद्देश्य।
जब लगभग 65 वर्ष पूर्व वर्ष 1950 में योजना आयोग का गठन किया गया था। तब भी इसका उद्देश्य देश का तीव्र विकास था और आज जब यह संस्था बूढ़ी हो चली तो विकास की नई आकांक्षाओं को परवान चढ़ाने के लिए गठित की जानी वाली नई संस्था ‘नीति आयोग’ का उद्देश्य भी देश का तीव्र विकास ही है। दोनों संस्थाओं के नाम अलग हो सकते हैं, रूप अलग हो सकते हैं, किंतु आत्मा एक है।

नया मंत्रिमंडल प्रस्ताव
15 मार्च, 1950 को जिस प्रस्ताव के माध्यम से योजना आयोग की स्थापना की गई थी उसके स्थान पर 1 जनवरी, 2015 को एक नया मंत्रिमंडल प्रस्ताव लाकर नीति आयोग की स्थापना की गई है। इस प्रकार नीति आयोग का गठन भी एक मंत्रिमंडल प्रस्ताव द्वारा हुआ तथा यह भी एक परामर्शदात्री एवं संविधानेतर संस्था है। प्रस्ताव जारी करते हुए सरकार ने बताया है कि यह संस्थान सरकार के थिंक टैंक के रूप में सेवाएं प्रदान करेगा और उसे निर्देशात्मक एवं नीतिगत गतिशीलता प्रदान करेगा।
परिवर्तन की जरूरत
यह प्रश्न लाजिमी है कि योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की जरूरत क्या थी? इसका उत्तर नीति आयोग के लिए लाए जाने वाले प्रस्ताव की प्रथम दो पंक्तियों में ही दिया गया है। महात्मा गांधी उद्धृत इन पंक्तियों में नीति आयोग का ‘दर्शन’भी निहित है-
“महात्मा गांधी ने कहा था : सतत विकास जीवन का नियम है, और जो व्यक्ति हमेशा हठधर्मिता को बनाए रखने की कोशिश करता है, स्वयं को भटकाव की ओर ले जाता है।’’
इस भावना को प्रदर्शित करते हुए और नए भारत के बदले माहौल में शासन और नीति के संस्थानों को नई चुनौतियों को अपनाने की जरूरत है, ऐसा प्रस्ताव में कहा गया है।
योजना आयोग के स्थान पर इस नए संस्थान की तो इतनी त्वरित जरूरत महसूस की गई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को ही लाल किले की प्राचीर से स्पष्ट उद्घोषित किया था कि योजना आयोग के स्थान पर नया संस्थान अस्तित्व में आएगा।
ऐसा माना जा रहा है कि योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग लाने की सबसे बड़ी वजह राज्यों की आवाज को अधिक जगह देना है। पहली बार मुख्यमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री चुने गए नरेंद्र मोदी ने अवश्य ही अपने मुख्यमंत्रित्व काल में राज्यों की भागीदारी में कमी महसूस की होगी।
नीति आयोग के लिए लाए गए प्रस्ताव की इन पंक्तियों को देखें-
‘‘केंद्र से राज्यों की ओर चलने वाले एक पक्षीय नीतिगत क्रम को एक महत्त्वपूर्ण विकासवादी परिवर्तन के रूप में राज्यों की वास्तविक और सतत भागीदारी से बदल दिया जाएगा।’’
यही कारण है कि योजना आयोग जहां पूर्णतः केंद्र द्वारा गठित निकाय था और इसमें राज्यों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था वहीं नीति आयोग की गवर्निंग कौंसिल में राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होंगे।
मार्च, 2014 में आयोजित इंडिया टुडे कान्क्लेव में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया और नीति आयोग के वर्तमान में उपाध्यक्ष बन चुके अरविंद पणगरिया दोनों ही शामिल हुए थे। कान्क्लेव में बोलते हुए श्री पणगरिया ने कहा था कि ‘योजना’ हमारी आदत बन चुकी है और इस आदत से हमें मुक्त होना होगा। उन्होंने कहा था कांग्रेस की खैरात बांटने वाली नीति अब काम नहीं करेगी। उनके अनुसार लोगों को सशक्त कीजिए, उन्हें नकद वाउचर दीजिए, यह उनकी इच्छा पर छोड़िए कि वे निजी क्षेत्र में जाते हैं या फिर सरकारी क्षेत्र में। दूसरी ओर डॉ. अहलूवालिया ने योजना आयोग की वकालत करते हुए कहा था कि इससे हमने विगत 10 वर्षों में समावेशी विकास के लक्ष्य को पाया है। उन्होंने मनरेगा जैसी योजनाओं को खैरात कहा जाना गलत माना था।
नीति आयोग की स्थापना हेतु लाए गए प्रस्ताव में मुख्यतः निम्न बिंदुओं के कारण इसकी आवश्यकता जताई गई थी।

  • नए भारत को एक प्रशासनिक बदलाव की जरूरत है।
  • सरकार को कानून बनाने, नीति निर्माण करने तथा विनियमन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • इस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि किसानों को उनकी उपज से वास्तविक लाभ प्राप्त हो।
  • मध्यवर्ग की क्षमता का पूर्ण दोहन किया जाना चाहिए।
  • भविष्य की राष्ट्रीय नीतियों में प्रवासी भारतीय समुदाय की ताकत को समावेशित किया जाना चाहिए।
  • सरकार और शासन उच्च पारदर्शिता के वातावरण में चलाया जाना चाहिए।
  • राष्ट्रीय विकास के हिस्सेदारी वाले दृष्टिकोण को मानव गरिमा, राष्ट्रीय आत्मसम्मान और समावेशी टिकाऊ पथ पर आधारित होना चाहिए।
  • विज्ञान प्रौद्योगिकी और ज्ञानपूर्ण अर्थव्यवस्था के मोर्चों पर कार्य करने के लिए हमें अपने युवाओं को उत्पादक अवसर उपलब्ध कराने के लिए कार्य करना चाहिए।
  • गांव हमारे लोकाचार, संस्कृति और जीविका के सदृढ़ आधार हैं। इन्हें विकास की प्रक्रिया में पूर्ण रूप से संस्थागत बनाए जाने की जरूरत है।
  • भारत में 50 मिलियन से अधिक छोटे व्यापार हैं। इस क्षेत्र को आवश्यक सहायता प्रदान करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
    हमारी पर्यावरण एवं पारिस्थिकीय परिसंपत्तियां शाश्वत हैं। इन्हें संरक्षित और रक्षित किया जाना चाहिए।

नीति आयोग के उद्देश्य

जिन कारणों से योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की जरूरत है उसके लिए इसके कुछ उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं। प्रमुख उद्देश्य ये हैं-

  • राज्यों की सक्रिय भागीदारी के साथ राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं, क्षेत्रों और रणनीतियों का एक साझा दृष्टिकोण विकसित करना।
  • प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को राष्ट्रीय एजेंडा का प्रारूप उपलब्ध कराना।
  • सहयोगपूर्ण संघवाद को बढ़ावा देना।
  • ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजना तैयार करने के लिए तंत्र विकसित करना।
  • आर्थिक कार्यनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को शामिल करना।
  • समाज के उन वर्गों पर विशेष रूप से ध्यान देना जिन तक आर्थिक प्रगति से उचित प्रकार से लाभान्वित न हो पाने का जोखिम हो।
  • रणनीतिक और दीर्घावधिक कार्यक्रम का ढांचा तैयार करना।
  • राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंक और शैक्षिक एवं नीति अनुसंधान संस्थानों के बीच भागीदारी के लिए परामर्श और प्रोत्साहन देना।
  • कार्यक्रमों और नीतियों के क्रियान्वयन के लिए प्रौद्योगिकी उन्नयन और क्षमता निर्माण पर बल प्रदान करना।

गठन प्रारूप

नीति आयोग का गठन निम्न प्रकार से होगा-

  • अध्यक्ष – भारत के प्रधानमंत्री
  • गवर्निंग काउंसिल – राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल।
  • क्षेत्रीय परिषद – विशिष्ट मुद्दों और ऐसे आकस्मिक मामले जिनका संबंध एक से अधिक राज्य क्षेत्र से हो, के लिए।
    – बैठक प्रधानमंत्री के निर्देश पर होगी।
    – परिषद में संबंधित क्षेत्र के राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होंगे।
  • विशेष आमंत्रित सदस्य – प्रधानमंत्री द्वारा नामित।
  • उपाध्यक्ष – प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त।
  • सदस्य – (i) पूर्ण कालिक (ii) अंशकालिक
  • पदेन सदस्य – केंद्रीय मंत्रिपरिषद से अधिकतम चार सदस्य, प्रधानमंत्री द्वारा नामित।
  • मुख्य संचालन अधिकारी – भारत सरकार के सचिव स्तर का अधिकारी, प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त।
  • सचिवालय – आवश्यकतानुसार

नाम नया, अधिकार क्या?

2 जनवरी, 2015 को योजना भवन के स्थान पर ‘नीति आयोग’ का नया बोर्ड लगा दिया गया है। इस परिवर्तन के क्रम में पहला कार्य यह किया गया है कि योजना आयोग की वेबसाइट को त्वरित प्रभाव से ‘संग्रहित’ (Archived) कर दिया गया है। योजना आयोग के सभी पूर्व दस्तावेजों को इस वेबसाइट पर देखा जा सकता है। एक बात और स्पष्ट है कि योजना आयोग द्वारा किए जाने वाले अधिकांश परंपरागत कार्य नीति आयोग को स्थानांतरित कर दिए जाएंगे। परंतु बहुत सी बातें अभी भी अस्पष्ट हैं; मसलन-

  • वर्तमान में जारी पंचवर्षीय योजना का क्या होगा?
  • राज्यों की वार्षिक योजनाओं का क्या होगा?
  • योजना के संबंध में राष्ट्रीय विकास परिषद की क्या भूमिका होगी?
  • मंत्रिपरिषद में योजना राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की भूमिका क्या होगी?
  • वर्तमान में राव इंद्रजीत सिंह योजना राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं।
  • नीति आयोग किन संस्थाओं के नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करेगा? उदाहरण के लिए डी.बी.टी. (DBT-Direct Benefit Transfer) की नोडल एजेंसी योजना आयोग था किंतु एल.पी.जी. सिलेंडर्स के लिए डी.बी.टी. के कार्यों का प्रबंधन तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
  • अधिकारियों के अनुसार डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT), भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI), अंतर्राज्यीय परिषद एवं कार्यक्रम मूल्यांकन संगठन ‘नीति आयोग’ के अंतर्गत होंगे। सभी के प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी होंगे।
    कार्यक्रम मूल्यांकन संगठन (PEO) एवं श्रम अर्थशास्त्र अनुसंधान एवं विकास के लिए राष्ट्रीय संस्थान द्वारा आयोजित 5 दिवसीय (19 जनवरी से 23 जनवरी, 2015) नीति कार्यक्रम द्वारा भी नीति आयोग के अधिकार क्षेत्र पर प्रकाश नहीं डाला गया। यद्यपि कि योजना राज्यमंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने अवश्य यह बताया कि नीति आयोग सक्रिय रूप से सरकारी कार्यक्रमों एवं पहलों का अधीक्षण करेगा और उनका मूल्यांकन करेगा। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र मूल्यांकन समूह (UNEG-United Nations Evaluation Group) वर्ष 2015 को ‘‘अंतर्राष्ट्रीय मूल्यांकन वर्ष’’ (International Year of Evaluation) के रूप में मना रहा है।

संसाधनों के आवंटन की भूमिका पर संशय

योजना आयोग के गठन हेतु प्रस्तुत मंत्रिमंडल के प्रस्ताव में राज्य सरकारों को संसाधनों के आवंटन (Allocation of Resources to State Governments) का कार्य भी सौंपा गया था परंतु नीति आयोग के गठन हेतु पेश वर्तमान प्रस्ताव इस विषय पर मौन है। न तो यह बताया गया है कि संसाधनों के आवंटन में नीति आयोग की भूमिका होगी अथवा नहीं और न यह ही बताया गया है कि यह कार्य अब कौन करेगा। अब ऐसा माना जा रहा है कि संसाधनों के आवंटन की भूमिका वित्त मंत्रालय को प्रदान कर दी जाएगी।

आयोजना अनुदान एवं गाडगिल-मुखर्जी फार्मूला
योजना आयोग अनुच्छेद 282 के तहत योजना अनुदान देता था। किस आधार पर राज्यों के बीच आयोजना अनुदान बांटा जाए इसके लिए चौथी योजना से गाडगिल फार्मूला स्वीकार किया गया था। वर्ष 1991 में तत्कालीन योजना आयोग के उपाध्यक्ष प्रणब मुखर्जी की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए गाडगिल-मुखर्जी फार्मूले के तहत अनुदान दिया जाने लगा। यह भी संशय का विषय है कि अब अनुदान इसी फार्मूले के तहत दिया जाएगा या फिर इसमें बदलाव होगा।
पूर्व केंद्रीय मंत्री वाह.के. अलघ का कहना है कि यदि नीति आयोग संसाधनों के बंटवारे का काम नहीं करेगा तो इसका काम अकादमिक ही रह जाएगा। बेशक अकादमियों में अच्छे लोग होते हैं जो निष्ठा से काम करते हैं। लेकिन यह भी साफ है कि अकादमिक कार्य विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों में ही सबसे अच्छे तरीके से होता है, न कि सरकारी निकायों में। सरकारी निकायों में शोध, समस्याओं को टालने का जरिया बन जाता है।

नवगठित नीति आयोग

पद

नाम

अध्यक्ष (पदेन) प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी 
उपाध्यक्षश्री अरविंद पणगरिया, अर्थशास्त्री
पूर्णकालिक सदस्य श्री बिबेक डेबरॉय, अर्थशास्त्रीडॉ. वी.के. सारस्वत, पूर्व सचिव रक्षा आरएंडडी
पदेन सदस्यश्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्रीश्री अरुण जेटली, केंद्रीय मंत्री

श्री सुरेश प्रभु, केंद्रीय मंत्री

श्री राधा मोहन सिंह, केंद्रीय मंत्री

विशेष आमंत्रितश्री नितिन गडकरी, केंद्रीय मंत्रीश्री थावर चंद गहलोत, केंद्रीय मंत्री

श्रीमती स्मृति इरानी, केंद्रीय मंत्री

अरविंद पणगरिया

  • अरविंद पणगरिया या अरविंद पानगड़िया संज्ञा नाम से जाने जाते हैं।
  • भारत-अमेरिकी (Indian-American) अर्थ शास्त्री हैं।
  • कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं।
  • एशियाई विकास बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री रहे हैं।
  • 5 जनवरी, 2015 को प्रधानमंत्री ने नीति आयोग का उपाध्यक्ष (Vice Chairman) नियुक्त किया।
  • इन्होंने प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पी.एच.डी. डिग्री हासिल की है।
  • श्री पणगरिया राजस्थान राज्य से संबंधित हैं।
  • इनकी नवीनतम पुस्तक “India : The Emerging Giant” है, जिसे आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित किया है।

आयोग या संस्थान (Commission or Institution)

नीति आयोग में नीति हिंदी शब्द (नीति अर्थात् Policy) नहीं है। यह अंग्रेजी संक्षिप्ताक्षर NITI है अर्थात ‘National Institution for Transforming India’ नीति के साथ आयोग भी लगा हुआ है अतः इसके नाम में ‘Institution’ (NITI में निहित I का पूर्ण रूप) अर्थात संस्थान भी है। NITI के बाद हिंदी शब्द आयोग जुड़ा हुआ है अतः यह आयोग भी है। ऐसा कभी नहीं देखने में आया कि किसी संस्था के नाम में आयोग और संस्थान दोनों हो।
पूर्व योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ‘Deputy Chairman’ थे जबकि नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पणगरिया ‘Vice Chairman’ हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि नीति आयोग एक संस्थान यानी Institution है।

परिवर्तन नहीं अंतरण की जरूरत

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है, इसी भावाधार पर योजना आयोग की जगह नीति आयोग को लाया गया है। लेकिन 65 वर्ष पुरानी ऐसी संस्था जो राष्ट्र की रसधार में निमज्जित हो का परिवर्तन नहीं बल्कि अंतरण किया जाना चाहिए। इसके लिए एक संक्रमण काल भी होना चाहिए जिस दौरान सभी नियमों, उपनियमों का निर्माण किया जा सके। बिना स्पष्ट परिभाषित संरचना के नीति आयोग के कार्यों के संबंध में संशय बना हुआ है। राज्यों को यह पता नहीं है कि उनकी वार्षिक योजना परिव्यय हेतु केंद्रीय अनुदान कैसे प्राप्त होगा? 7 दिसंबर, 2014 को नीति आयोग के गठन पर चर्चा हेतु बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक में भी इसी प्रकार के प्रश्न उठे थे। यदि नीति आयोग के पास संसाधनों के आवंटन की भूमिका नहीं रहना है तो यह तय होना चाहिए कि इस भूमिका को कौन निभाएगा। नए आयोग के लिए कार्य क्षेत्र भी सुनिश्चित होना चाहिए जैसा कि कुछ प्रख्यात अर्थशास्त्री सुझाते हैं इस प्रकार-

  • इसे 2 दशक की तय समय सीमा में देश को विकासशील श्रेणी से विकसित श्रेणी में लाने का लक्ष्य सौंपा जाना चाहिए।
    सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों हेतु केंद्र राज्य की स्पष्ट भूमिका तय हो।
  • सरकार के निचले स्तर तक वित्तीय विकेंद्रीकरण का लक्ष्य दिया जाए।
  • यह भी देखा जाना चाहिए कि संसाधनों के आवंटन की भूमिका से विमुखता कहीं इस संस्था को बिना दांत वाला शेर (Toothless Tiger) न बना दे।
  • नए आयोग के एजेंडे में ऊर्जा, जल और जनसंख्या जैसे दीर्घकालिक महत्त्व के मुद्दों को प्रमुखता मिलनी चाहिए। चीन में
  • यही किया गया था जब वहां स्टेट प्लानिंग कमीशन को हटाकर उसकी जगह ‘नेशनल इकोनॉमिक एंड सोशल डेवलपमेंट कमीशन’ का गठन किया गया था।

प्रख्यात अर्थशास्त्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री वाई.के. अलघ चेताते हुए कहते हैं “नीति आयोग के समक्ष यह चुनौती रहेगी कि कैसे हम अपने जनसंख्या का अधिकतम लाभ उठाएं। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी हमारे पास है। इस कामकाजी आबादी का देश के विकास में अधिकतम इस्तेमाल करना सरकार का दायित्व है।
आगे देखना है कि नवगठित नीति आयोग देश की उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है, फिलहाल इसे कुछ वक्त दिया जाना चाहिए।