नवीन मेट्रो नीति

New metro policy

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा भारत के विभिन्न शहरों में मेट्रो रेल सेवाओं के विस्तार एवं विनियमन हेतु स्वीकृत नवीन नीति।

  • उद्देश्य
    बड़ी संख्या में शहरों की बढ़ती हुई मेट्रो रेल की आकांक्षाओं को पूरा करना।
  • विशेष तथ्य तथा प्रावधान
  • 16 अगस्त, 2017 को केंद्रीय कैबिनेट ने नवीन मेट्रो नीति को स्वीकृत किया।
  • पूंजीगत गहन उच्च क्षमता वाले मेट्रो परियोजनाओं के लिए भारी संसाधन मांग को पूरा करने के लिए निजी निवेश और मेट्रो परियोजनाओं के वित्तपोषण के अन्य अभिनव रूपों को अनिवार्य कर दिया गया है।
  • अपर्याप्त उपलब्धता तथा अंतिम छोर तक संपर्क के अभाव को देखते हुए राज्यों को मेट्रो स्टेशनों के दोनों ओर 5 किलोमीटर का सुविधा क्षेत्र छोड़ना अनिवार्य होगा ताकि फ्रीडर सेवाओं, पैदल, साइकिल मार्ग तथा पार-परिवहन सुविधाओं से अंतिम छोर तक संपर्क किया जा सके।
  • नई मेट्रो परियोजनाओं का प्रस्ताव करने वाले राज्यों के लिए परियोजना रिपोर्ट में यह इंगित करना आवश्यक होगा कि उपरोक्त सेवाओं हेतु प्रस्ताव तथा निवेश किया जाएगा।
  • सार्वजनिक परिवहन हेतु कम लागत वाली पारगमन मोड का चयन सुनिश्चित करने हेतु नई नीति में वैकल्पिक विश्लेषण को आवश्यक किया गया है जिसमें मांग, क्षमता, लागत और कार्यान्वयन में आसानी के संदर्भ में बड़े पैमाने पर परिवहन के अन्य तरीकों यथा बीआरटीएस (बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम), लाइट रेल ट्रांजिट, ट्रामवेज, मेट्रो रेल तथा क्षेत्रीय रेल आदि के मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।
  • शहरी महानगरीय परिवहन प्राधिकरण (यूएमटीए)
  • इस नीति में शहरी महानगरीय परिवहन प्राधिकरण (यूएमटीए) की स्थापना को अनिवार्य बनाया गया है।
  • यह प्राधिकरण शहरों के लिए आवाजाही संबंधी व्यापक योजना तैयार करेगा, ताकि क्षमता के अधिकतम उपयोग के लिए पूरी तरह बहु मॉडल एकीकरण सुनिश्चित हो सके।
  • नए मेट्रो प्रस्तावों का मूल्यांकन
  • नई मेट्रो रेल नीति में नए मेट्रो प्रस्तावों के कठोर मूल्यांकन का प्रावधान है।
  • इसमें सरकार द्वारा चिह्नित एजेंसियों द्वारा स्वतंत्र तीसरे पक्ष के मूल्यांकन का भी प्रस्ताव है।
  • नई मेट्रो रेल नीति में मेट्रो परियोजनाओं के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय लाभों को ध्यान में रखते हुए वैश्विक व्यवहारों के अनुरूप मेट्रो परियोजनाओं को मंजूर करने के लिए वर्तमान वित्तीय आंतरिक रिटर्न दर 8 प्रतिशत की व्यवस्था को बदलकर 14 प्रतिशत आर्थिक आंतरिक रिटर्न दर की व्यवस्था का प्रावधान है।
  • वैल्यू कैप्चर वित्तपोषण उपाय
  • राज्यों के लिए मेट्रो परियोजनाओं के वित्तपोषण हेतु वैल्यू कैप्चर वित्तपोषण उपायों जैसे नवाचारी तरीके अपनाना आवश्यक किया गया है।
  • उल्लेखनीय है कि वैल्यू कैप्चर वित्तपोषण (वीसीएफ) एक अभिनव शहरी-विकास निधि और राजस्व उत्पादन उपकरण (Tool) है जो एक कर संग्रहण तंत्र के रूप में कार्य करता है और इसका लक्ष्य निजी जमीन-मालिकों के लिए सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर उत्पन्न करना है।
  • मेट्रो परियोजनाएं वित्तीय दृष्टि से व्यावहारिक हों इसके लिए राज्यों को परियोजना रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करना होगा कि मेट्रो स्टेशनों और उसकी अन्य शहरी भूमि पर वाणिज्यिक/संपत्ति के विकास के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।
  • आमदनी का ब्योरा तथा कानून निर्माण
  • राज्यों को यह भी बताना होगा कि वैधानिक सहायता के अतिरिक्त यात्री किराए से इतर अन्य साधनों जैसे-विज्ञापनों, जगह के लीज पर देने आदि से कितनी अधिकतम आमदनी हो सकेगी।
  • राज्यों को कायदे-कानून निर्माण का भी अधिकार होगा और किरायों में समय से संशोधन के लिए स्थायी किराया निर्धारण प्राधिकरण गठित कर सके।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी
  • नई मेट्रो नीति में मेट्रो सेवाओं के संचालन और रख-रखाव (ओ एंड एम) मे विभिन्न प्रकार से निजी क्षेत्र की भागीदारी की व्यवस्था की गई है जो इस प्रकार है-
    i. लागत और शुल्क अनुबंध
    निजी ऑपरेटर को रेल प्रणाली के संचालन और रख-रखाव के लिए मासिक/वार्षिक आधार पर भुगतान किया जाता है।
    इसके सेवाओं की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए निश्चित और परिवर्तनशील घटक हो सकते हैं।
    संचालनात्मक और राजस्व संबंधी जोखिम सरकार द्वारा उठाया जाएगा।
    ii. सकल लागत अनुबंध
    निजी ऑपरेटर को अनुबंध की अवधि के लिए एक निश्चित राशि का भुगतान किया जाता है।
    ऑपरेटर को संचालन और रख-रखाव का जोखिम उठाना होगा जबकि सरकार को राजस्व संबंधी जोखिम उठाना होगा।
    iii. शुद्ध लागत अनुबंध
  • ऑपरेटर उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं से अर्जित समूचा राजस्व एकत्र करता है।
  • अगर राजस्व आय संचालन और रख-रखाव लागत से कम हुई तो स्वामी मुआवजा देने के बारे में सहमत हो सकता है।
  • नई मेट्रो नीति से लाभ
  • यह नीति अनेक मेट्रो संचालनों में बड़े पैमाने पर निजी निवेश का द्वार खोलने में सहायक होगी क्योंकि इस नीति के अंतर्गत केंद्रीय सहायता प्राप्त करने के लिए पीपीपी घटक अनिवार्य बनाया गया है।
  • केंद्रीय वित्तीय सहायता की इच्छुक सभी मेट्रो रेल परियोजनाओं में संपूर्ण प्रावधान हेतु या कुछ अलग-अलग घटकों (स्वचालित किराया संग्रह, सेवा संचालन और रख-रखाव इत्यादि) के लिए निजी भागीदारी आवश्यक होगी जिससे निजी संसाधनों, विशेषज्ञता और उद्यमिता का लाभ मिलेगा।
  • नीति में ऐसे प्रावधान किए गए हैं कि शहरी सार्वजनिक ट्रांजिट परियोजनाएं केवल शहरी परिवहन परियोजनाओं के बजाय शहरी परिवर्तन परियोजनाओं के रूप में परिलक्षित होंगी।
  • उपरोक्त लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए इसमें ट्रांजिट प्रेरित विकास (टीओडी) का प्रावधान है जिससे मेट्रो गलियारों के साथ-साथ सटीक और घने शहरी विकास को प्रोत्साहित किया जा सकेगा क्योंकि ट्रांजिट प्रेरित विकास आवागमन की दूरी को कम करता है।
  • राज्य मेट्रो परियोजनाओं हेतु कॉर्पोरेट बॉण्ड जारी कर किफायती पूंजी प्रदान करने में सहायक होंगे।
  • मेट्रो परियोजनाएं शुरू करने के लिए केंद्रीय सहायता प्राप्त करने हेतु राज्यों के पास तीन विकल्प होंगे-
    i. वित्त मंत्रालय की वायसिलिटी गैप फंडिंग (कम पड़ती धन राशि की व्यवस्था) योजना के तहत केंद्रीय सहायता युक्त सार्वजनिक निजी भागीदारी के जरिए
    ii. भारत सरकार के अनुदान के माध्यम से जिसके तहत परियोजना लागत का 10 प्रतिशत एकमुश्त केंद्रीय सहायता के रूप में दिया जाएगा, और
    iii. केंद्र एवं राज्य सरकारों के मध्य 50:50 प्रतिशत आधार पर इक्विटी साझेदारी मॉडल के जरिए।
    इन तीनों ही विकल्पों में निजी भागीदारी अनिवार्य होगी।
  • वर्तमान में चालू मेट्रो परियोजनाएं
  • वर्तमान में 8 राज्यों के विभिन्न शहरों में कुल 370 किलोमीटर की मेट्रो परियोजनाएं चालू हैं। ये शहर हैं-
    i. दिल्ली (217 किमी.)
    ii. बंगलुरू (42.30 किमी.)
    iii. कोलकाता (27.39 किमी.)
    iv. चेन्नई (27.36 किमी.)
    v. कोच्चि (13.30 किमी.)
    vi. मुंबई (मेट्रो लाइन I- 11.40 किमी., मोनो रेल फेज I- 9.0 किमी.)
    vii. जयपुर (9 किमी.)
    viii. गुरुग्राम (रैपिड मेट्रो-1.60 किमी.)
  • शहर जिनमें नवीन मेट्रो परियोजनाएं प्रस्तावित हैं-
  • उपरोक्त 8 राज्यों सहित 13 राज्यों में कुल 537 किमी. लंबाई की मेट्रो परियोजनाओं का काम चल रहा है।
    मेट्रो सेवाओं की अपेक्षा करने वाले नए शहर हैं-
    i. हैदराबाद (71 किमी.)
    ii. नागपुर (38 किमी.)
    iii. अहमदाबाद (36 किमी.)
    iv. पुणे (31.25 किमी.)
    v. लखनऊ (23 किमी.)
  • उल्लेखनीय है कि 13 शहरों जिनमें 10 नए शहर भी शामिल हैं, में 595 किमी. कुल लंबाई की मेट्रो परियोजनाएं नियोजन और स्वीकृति के विभिन्न चरणों में चल रही हैं।

लेखक-अम्बरीश कुमार तिवारी