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चिकनगुनिया का प्रथम टीका

Chikungunya vaccine first

चिकनगुनिया एक विषाणु जनित (Viral) रोग है। इस रोग के विषाणु संक्रमित मादा मच्छरों के काटने से मनुष्यों में संचारित होते हैं। प्रायः ‘एडीज इजिप्टी’ (Aedes Aegypti) तथा ‘एडीज अल्बोपिक्टस’ (Aedes Albopictus) नामक मच्छरों की प्रजातियां चिकनगुनिया के विषाणु की वाहक होती हैं। इस रोग में बुखार के साथ जोड़ों में तेज दर्द होता है। साथ ही सिर दर्द, मांसपेशियों में दर्द, थकान एवं शरीर पर चकत्ते जैसे लक्षण भी प्रकट हो सकते हैं। वर्तमान में इस रोग के उपचार हेतु कोई विशिष्ट विषाणु-रोधी औषधि उपलब्ध नहीं है और न ही ऐसा कोई टीका ही व्यावसायिक रूप से बाजार में उपलब्ध है जिससे इस रोग की रोकथाम की जा सके। वर्तमान में चिकनगुनिया का उपचार ज्वरनाशक एवं पीड़ानाशक औषधियों के प्रयोग द्वारा इस रोग के लक्षणों को दूर करने तक ही सीमित है।

  • 19 दिसंबर, 2016 को चिकित्सा के क्षेत्र के प्रतिष्ठित जर्नल ‘नेचर मेडिसिन’ (Nature Medicine) में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, हाल ही में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने चिकनगुनिया के प्रथम टीके के विकास में सफलता प्राप्त की है।
  • इस टीके को ऐसे विषाणु से विकसित किया गया है जिसका मनुष्यों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता और इस कारण यह टीका मनुष्यों के लिए सुरक्षित और प्रभावी साबित हो सकता है।
  • उल्लेखनीय है कि जिस विषाणु से इस टीके को विकसित किया गया है, वह केवल कीटों (Insects) को ही संक्रमित करता है।
  • अमेरिका के टेक्सास के गैलवेस्टन स्थित ‘यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास मेडिकल ब्रांच’ (UTMB) के शोधकर्ताओं ने इस टीके का विकास किया है।
  • ज्ञातव्य है कि किसी टीके (Vaccine) के विकास के दौरान इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वह तीव्र एवं स्थायी प्रतिरक्षण तो प्रदान करे ही, साथ ही सुरक्षित भी हो।
  • चूंकि ‘लाइव एटीनूएटेड टीके’ (Live Attenuated Vaccines) जीवित विषाणुओं को प्रभावहीन (निर्बल) कर विकसित किए जाते हैं, इसलिए वे तीव्र एवं स्थायी प्रतिरक्षण तो प्रदान करते हैं, परंतु ‘मृत विषाणुओं के प्रयोग द्वारा निर्मित टीकों’ (Inactivated Vaccines) की तुलना में कम सुरक्षित होते हैं।
  • इसके विपरीत मृत विषाणुओं द्वारा निर्मित टीके सुरक्षा के मानकों पर तो खरे उतरते हैं, परंतु वे उतने प्रभावी नहीं होते और इन्हें प्रभावी बनाने हेतु इनकी कई खुराकों एवं बूस्टरों की आवश्यकता पड़ती है।
  • अगर टीके के विकास हेतु विषाणुओं को पूरी तरह से निष्क्रिय या प्रभावहीन नहीं किया गया, तो इन दोनों प्रकार के टीकों से ही रोग का खतरा भी बढ़ जाता है।
  • इस समस्या से उबरने के लिए अमेरिकी शोधकर्ताओं ने चिकनगुनिया के टीके के विकास हेतु ‘ईलैट विषाणु’ (Eilat Virus) का प्रयोग किया, क्योंकि यह केवल कीटों को ही संक्रमित करता है और मनुष्यों पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता।
  • चूहों तथा अन्य प्राइमेट्स पर शोध में यह पाया गया कि यह टीका उनके शरीर में एक मजबूत प्रतिरक्षा तंत्र विकसित करता है और चिकनगुनिया के विषाणु की चपेट में आने पर इस रोग से उनकी पूरी तरह रक्षा करता है।

लेखक-सौरभ मेहरोत्रा