क्लब-गोपनीय

(स्रोत : द हिंदू : 2 जनवरी, 2016)

मूल लेखक- विजय लोकपाली

कथित वित्तीय अनियमिताएं, स्टेडियम के निर्माण में भारी अपव्यय, बहुधा एक ही ओर के राजनैतिक व्यक्तियों में आपसी टकराव। स्थापित सत्ता को बनाए रखने वाले प्रतीकात्मक मतदान की विस्तृत प्रणाली, वार्षिक बही खाते का खुलासा या प्रस्तुत न किया जाना और कर अपराध। दिल्ली तथा जिला क्रिकेट संघ के बीच विवादास्पद गतिविधियां तथा इस दौर में डीडीसीए (DDCA) के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री के बीच शुरू हुए राजनैतिक टकराव जनता के बीच चर्चा में हैं। डीडीसीए तो फिर भी उस रहस्यमय संस्था का छोटा-सा हिस्सा है, जो अपनी मातृ संस्था ‘भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड’ (BCCI) की आंतरिक कार्यप्रणाली और इसकी गलतियों को प्रतिबिंबित करता है।
यह उस सर्दीली दोपहर की तरह नहीं था जब 28 दिसंबर, 1928 को उत्तरी दिल्ली के चहल-पहल भरे घंटाघर के बीच विलक्षण रोशानारा क्लब में, बोर्ड अस्तित्व में आया। वर्षों तथा दशकों से क्रिकेट प्रशासन उन लोगों द्वारा संचालित है जिन्हें क्रिकेट में एक सामान्य दिलचस्पी से अधिक कुछ नहीं है। प्रो. रत्नाकर शेट्टी, बोर्ड के मुख्य प्रशासी अधिकारी जो वर्ष 1970 के दौरान मुंबई में स्थानीय क्रिकेट टूर्नामेंट के दौर में क्रिकेट प्रशासन से संबद्ध रहे, कहते हैं वे समय भी थे जब हमें अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़ता था। बीसीसीआई का कार्यालय अधिकारियों के घरों से चलाया जाता था। तात्कालिक क्रिकेट के प्रतीक के रूप में आईपीएल (IPL) के उद्भव से हुए करोड़ों के बाजारी सौदों के साथ जैसे-जैसे खेल टेलीविजन दर्शकों की वृद्धि से बढ़ा, दावे बढ़ते गए। आज बीसीसीआई (BCCI) अपने 1,200 करोड़ रुपये के खजाने के साथ मुंबई की एक आलीशान इमारत से कार्य करता है, यह भारत का सबसे धनी खेल संघ है। यह तो वर्ष 2013 का आईपीएल (IPL) स्पॉट-फिक्सिंग घोटाला था जिसने-जाहिर तौर पर तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत एक निजी संस्था की ओर अंततोगत्वा जनता की दिलचस्पी तथा कानूनी छान-बीन को आमंत्रित किया। उच्चतम न्यायालय ने बीसीसीआई की कार्यप्रणाली में सुधार एवं जांच के लिए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा (R.M. Lodha) की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पैनल का गठन किया, समिति अपनी रिपोर्ट 4 जनवरी को प्रस्तुत करने वाली है।
गुप्त संस्था
लोढ़ा समिति का बीसीसीआई (BCCI) से विभिन्न समस्याओं पर 82 प्रश्नों पर सामना हुआ, जैसे सरोकारों में टकराव, बोर्ड की संरचना, नियमों तथा उपनियमों में वर्ष-दर-वर्ष किए गए संशोधन, विभिन्न समितियों में से प्रत्येक का आधार और समितियों के सदस्यों के चुनने का आधार, वाणिज्यिक गतिविधियों का कार्य ढांचा, ठेके तथा सेवाएं।
बोर्ड की समस्याओं की शृंखला इसकी जटिल संरचना के साथ शुरू होती है। अपने निर्माण के वर्षों में 6 सदस्यों वाली संस्था से बढ़कर ये 30 इकाइयों वाले संघ के रूप में बढ़ गया जो अब बीसीसीआई के अधिकारियों का चुनाव करता है। इसमें से 27 इकाइयां प्रथम श्रेणी की क्रिकेट प्रतियोगिता रणजी ट्रॉफी के लिए टीमें उतारती हैं। नेशनल क्रिकेट क्लब, ‘क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया’ और अखिल भारतीय विश्वविद्यालय को मतदान का अधिकार है, लेकिन गर्व करने के लिए टीम नहीं है। बीसीसीआई ने इस प्रकार उनके मतदान अधिकार का जमकर बचाव किया है। एक दीर्घकालीन बोर्ड अधिकारी पूछते हैं कि आप कैसे केवल इस बात पर, क्योंकि वे कोई टीम नहीं उतारते, प्रारंभिक सदस्यों को हटा सकते हैं।
बोर्ड जो कि रणजी ट्रॉफी खेलने वाली प्रत्येक संबद्ध इकाई को वार्षिक सब्सिडी देता है यह कारण भी नहीं समझा सका कि यही सुविधा वह सेवाओं तथा रेलवे को क्यों नहीं दे पा रहा है, ये सेवाओं तथा रेलवे से कोई राष्ट्रीय चुनावकर्ता भी नहीं लेता। लोढ़ा समिति के पास बीसीसीआई से तर्क-वितर्क के लिए यह मामला है। बोर्ड ने समिति की सिफारिशों को स्थान देने के प्रयास में नए अध्यक्ष शशांक मनोहर के तहत प्रशासन में सुधार तथा पारदर्शिता लाने हेतु शृंखलाबद्ध कदम उठाए हैं। इसके संविधान को अब ऑनलाइन पर देखा जा सकता है। 18 अक्टूबर को बोर्ड ने राज्य संघों को दी गई निधियों के उपयोग की जांच हेतु ‘प्राइसवाटर हाउस कूपर्स’ (Pricewater House Coopers) को नियुक्त किया है।
9 नवंबर को इसने सेवानिवृत्त न्यायाधीश ए.पी. शाह को लोकपाल नियुक्त किया है।
फिर भी आंतरिक रूप में बड़ी समस्याएं मौजूद हैं। बीसीसीआई से संबद्ध विभिन्न इकाइयों के संविधान अलग-अलग हैं और कुछ मामलों में तो ये, बोर्ड द्वारा आवश्यक बनाए जाने के बावजूद, जनता की जांच से परे है। अन्य विवादास्पद समस्याओं के बीच लोढ़ा समिति, खिलाड़ियों के चयन में स्वेच्छाचारिता एवं संस्थाओं को परेशान करने वाली वित्तीय अनियमितताओं के मामलों को देख रही है। जैसे कि ये जम्मू तथा कश्मीर, हैदराबाद, दिल्ली, असम, केरल, गोवा, झारखंड और बड़ौदा, अन्य के बीच, सभी विभिन्न मामलों में जांच का सामना कर रहे हैं।
नियमितता (Clockwork Precision)
संस्थात्मक अव्यवस्था के होते हुए भी, बीसीसीआई के कार्यक्रम में एक क्षेत्र लगभग संदेह से परे है। जबकि बहुत से खेल संघ वार्षिक रूप से राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं नहीं करा सके, रणजी ट्रॉफी ने कभी अपनी वार्षिक तारीख में प्रथम संस्करण 1934 से लेकर अब तक, कोई चूक नहीं की। दो वर्गों ‘इलीट’ तथा ‘प्लेट’ के रूप में 27 टीमों की भागीदारी भी इसी अखिल भारतीय उपस्थिति को दर्शाती है। यहां तक कि सामान्य आयोजन जैसे महिला एवं आयुवर्ग टूर्नामेंट भी एक निश्चित क्रम का पालन करते हैं। श्री शेट्टी दावा करते हैं कि हमारे पास दुनिया में कनिष्ठ (Junior) आयु वर्ग क्रिकेट का उत्तम ढांचा है।
अधिकांश धन जो बीसीसीआई प्रसारण अधिकारों से पैदा करता पुनः खेलों पर खर्च कर दिया जाता है। इसकी आय का 70 प्रतिशत सभी पूर्ण सदस्यों में बराबर बांट दिया जाता है अर्थात इससे संबद्ध प्रत्येक वास्तव में कम-से-कम 23 करोड़ रु. वार्षिक प्राप्त करता है। ‘बीसीसीआई को अपनी आय को खिलाड़ियों के साथ बांटने में गर्व है (13 प्रतिशत अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों को तथा इतना ही घरेलू खिलाड़ियों के लिए)। एक घरेलू खिलाड़ी को लगभग 20,000 रु. प्रति खेल दिवस मिलता है।’ पंजाब क्रिकेट संघ के सचिव एक वयोवृद्ध क्रिकेट प्रशासक एम.पी. पांडोव कहते हैं।
*धन का लालच (Lure of the Lucre)
तब क्या गलत हो गया? अनुशासन समिति के सदस्य निरंजन शाह महसूस करते हैं कि यदि एन. श्रीनिवासन, अपने परिवार द्वारा चलाई जाने वाली कंपनी के स्वामित्व वाली टीम चेन्नई सुपर किंग्स के सट्टा/स्पॉट फिक्सिंग विवाद में आने के बाद, इस्तीफा दे देते तो न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पड़ती। वे कहते हैं कि सारा गड़बड़झाला कहीं न कहीं एक व्यक्ति के हठीलेपन के कारण हुआ।
आईपीएल (IPL) प्रशासनिक समिति के सदस्य अजय शिरके कहते हैं ‘‘यह मुख्यतया एक संवेदनशील समस्या है। बीसीसीआई एक अपारदर्शी संस्था नहीं है, अगर ऐसा होता तो यह इतनी विकसित नहीं होती।’’
किसी चीज से अधिक, फिर भी समस्याएं खेल में अत्यधिक पैसे के आने से हैं। दोनों पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष स्वर्गीय श्री जगमोहन डालमिया तथा आई.एस. बिंद्रा वे व्यक्ति थे जो क्रिकेट में पैसा लाने के सूत्रधार रहे। पांडोव कहते हैं-‘‘जब एम.ए.सी. (एम.ए. चिदंबरम) इसके अध्यक्ष थे बीसीसीआई एक आत्मनिर्भर संस्था थी। डालमिया तथा श्री बिंद्रा ने पैसा लाने के लिए टेलीकास्ट पक्ष का दोहन किया।’’
आईपीएल (IPL) के रूप में क्रिकेट मनोरंजन बहुत व्यापक हो गया है और बोर्ड के धन समृद्ध और भी धनी हो जाने से जिम्मेदारियों में वृद्धि हुई है। श्री शेट्टी ने स्वीकार किया कि आईपीएल (IPL) पैसे के साथ-साथ समस्याएं भी लाया है।
इसकी वर्तमान आर्थिक समृद्धि की विपरीत वर्ष 1983 की स्थिति जब भारत ने इंग्लैंड में विश्व कप जीता था। उस समय के बीसीसीआई अध्यक्ष एन.के.पी. साल्वे ने प्रत्येक खिलाड़ी के लिए 100,000 रुपये की घोषणा की थी, इसी से महसूस किया जा सकता है कि संस्था के पास आवश्यक धन का अभाव था। दिल्ली में इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु धन उगाही के लिए लता मंगेशकर के कार्यक्रम का आयोजन किया गया। एक बार श्री डालमिया ने बीसीसीआई में परिवर्तनों के लिए प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा-‘‘ये वे दिन थे जब क्रिकेट व्यावसायिक नहीं था और पैसा इस खेल के प्रति लोगों के आकर्षण का कारण नहीं था।’’ समय बदल गया है, बेहतर और बदतर के लिए।

अनुवादक
राजेश त्रिपाठी